रविवार, 13 अक्टूबर 2013
शनिवार, 5 अक्टूबर 2013
एक बहादुर बच्ची के लिए …
बचपन में यूँ ही खेल -खेल में वह मां से पूछ बैठी थी कि ''मां ये आसमान इतना छोटा क्यूँ है? '' और तब सबको हँसी आयी थी उसकी बात पर ……, लेकिन जब उसने जीवन के अर्थ को तलाशना शुरू किया, और हज़ार ठोकरों से गिरकर संभालना शुरू किया तो अपनी क्षमताओं को सही -सही परख पाई वो.… ।
और आज जब कोई मुश्किल उसे नही रोक पाई और सचमुच उड़ान भरने को जी चाहा …
तो उसे बचपन के उसी सवाल की फिर याद आ गई कि '' ये आसमान इतना छोटा क्यूँ है ?''
…. और इस बार उसने आईने से कहा
'' जो देखनी हो मेरी उड़ान….
तो आसमान से कहो थोडा और ऊंचा हो जाए.… ''
बचपन में यूँ ही खेल -खेल में वह मां से पूछ बैठी थी कि ''मां ये आसमान इतना छोटा क्यूँ है? '' और तब सबको हँसी आयी थी उसकी बात पर ……, लेकिन जब उसने जीवन के अर्थ को तलाशना शुरू किया, और हज़ार ठोकरों से गिरकर संभालना शुरू किया तो अपनी क्षमताओं को सही -सही परख पाई वो.… ।
और आज जब कोई मुश्किल उसे नही रोक पाई और सचमुच उड़ान भरने को जी चाहा …
तो उसे बचपन के उसी सवाल की फिर याद आ गई कि '' ये आसमान इतना छोटा क्यूँ है ?''
…. और इस बार उसने आईने से कहा
'' जो देखनी हो मेरी उड़ान….
तो आसमान से कहो थोडा और ऊंचा हो जाए.… ''
बुधवार, 2 अक्टूबर 2013
रात चाँद और मैं !
रात चाँद और मैं !
रे चांद ! क्यों जागते रहते हो सूनी रातों में …. अकेले
जलते रहते हो हल्की आग में , मद्धिम-मद्धिम …
इतनी तपिश कि सिर्फ उजाला हो… कोई झुलसे न।
अरे! जलता तो सूरज भी है , मगर वो अपने साथ इस दुनियां को भी जलाता है।
और तुम , खुद जलते हो और दुनिया को सुलाते हो।
हे चाँद ! तुम मुझे कोई पहरेदार लगते हो …
सारी दुनिया के पहरेदार …
कभी-कभी तुम मुझे वो दिया की ढिबरी लगते हो ,,,,
जिसे मेरी माँ सोने से पहले अक्सर बुझाना भूल जाती थी ….
और वो मासूम सा चिराग रात भर टिम-टिमाता रहता था।
. .
….रे चाँद ! मैं भी कई रातों से तुम्हारे साथ जाग रहा हूँ ,
और मेरा 'हर दिन' सूरज की आग में जल जाता है।
तुम तो कई सदियों से रातभर जागते रहे हो …
'तुम्हारा दिन' कैसा गुजरता है ??????????????
रे चांद ! क्यों जागते रहते हो सूनी रातों में …. अकेले
जलते रहते हो हल्की आग में , मद्धिम-मद्धिम …
इतनी तपिश कि सिर्फ उजाला हो… कोई झुलसे न।
अरे! जलता तो सूरज भी है , मगर वो अपने साथ इस दुनियां को भी जलाता है।
और तुम , खुद जलते हो और दुनिया को सुलाते हो।
हे चाँद ! तुम मुझे कोई पहरेदार लगते हो …
सारी दुनिया के पहरेदार …
कभी-कभी तुम मुझे वो दिया की ढिबरी लगते हो ,,,,
जिसे मेरी माँ सोने से पहले अक्सर बुझाना भूल जाती थी ….
और वो मासूम सा चिराग रात भर टिम-टिमाता रहता था।
. .
….रे चाँद ! मैं भी कई रातों से तुम्हारे साथ जाग रहा हूँ ,
और मेरा 'हर दिन' सूरज की आग में जल जाता है।
तुम तो कई सदियों से रातभर जागते रहे हो …
'तुम्हारा दिन' कैसा गुजरता है ??????????????
बुधवार, 11 सितंबर 2013
उसने कभी भीख नहीं मांगी,
उसने तो हमेशा रोका है उस भूखे पेट वाली स्त्री को..
जो बढा देती है कटोरा, हर आते-जाते के सामने..
पेट के लिए
ये जानते हुए भी कि कोई अनायास भी नहीं देखेगा..
जानबूझ कर बना देंगे उसे होते हुए भी न होने जैसा..
वो बीच चौराहे पर खडी नहीं दिखेगी किसी को भी .
और कभी-कभी वो कामयाब हो जाती है खुद को रोकने में..
और धोती के एक पल्लू से पसीना पोंछने के बहाने छुपा लेती है अपना चेहरा ..
...............मगर, जब फिर पेट में कुछ दौड़ता है तो बैचेन हो जाती है..
.....लेकिन जैसे ही एक मासूम आवाज़ उसके कानों को चीरती है,
तो अचानक वो पेट वाली स्त्री छुडाकर खुद से हाथ,
फैला देती है किसी के आगे.!
उसने तो हमेशा रोका है उस भूखे पेट वाली स्त्री को..
जो बढा देती है कटोरा, हर आते-जाते के सामने..
पेट के लिए
ये जानते हुए भी कि कोई अनायास भी नहीं देखेगा..
जानबूझ कर बना देंगे उसे होते हुए भी न होने जैसा..
वो बीच चौराहे पर खडी नहीं दिखेगी किसी को भी .
और कभी-कभी वो कामयाब हो जाती है खुद को रोकने में..
और धोती के एक पल्लू से पसीना पोंछने के बहाने छुपा लेती है अपना चेहरा ..
...............मगर, जब फिर पेट में कुछ दौड़ता है तो बैचेन हो जाती है..
.....लेकिन जैसे ही एक मासूम आवाज़ उसके कानों को चीरती है,
तो अचानक वो पेट वाली स्त्री छुडाकर खुद से हाथ,
फैला देती है किसी के आगे.!
गुरुवार, 5 सितंबर 2013
DEAR TEACHERS,
एक चिटठा गुरु के नाम
- कुमार विनयजिनके नजरिए से हमें देखने की ताकत मिलती है। जिनके प्रशिक्षण से हमें सही और गलत फैसले लेने का विवेक मिलता है। जो अपनी कर्मठता बुद्धि ज्ञान से हमें भविष्य का श्रेष्ठ नागरिक बनाते है। जिनकी शिक्षा से हमें जीवन को सार्थक बनाने का तजुर्बा मिलता है……. ऐसे ब्रह्म तुल्य गुरुओं का आज शिक्षक दिवस पर वंदन और अभिनन्दन है।
DEAR TEACHERS,
हम अपनी आँखों में कुछ सपने लेकर आपके पास आते हैं, और न जाने कब हमारे सपने आपका लक्ष्य बन जाते हैं. आप हमें वो बनाना चाहते हैं जो हम बनना चाहते हैं। बचपने में हमने इतने सपने तो देख लिए पर ये नहीं पता था कि इन्हें हकीकत बनाना इतना आसान नहीं होता। मगर आप ही तो हमेशा सिर पर हाथ रखकर कह देते हो-"बेटा कुछ भी असंभव नहीं है, लगन से मेहनत करो, तुम जरूर सफल होगे। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है।"
सपने हम सजाते हैं…… और उन्हें हकीकत आप बनाते हैं।
DEAR TEACHERS,
चलना तो माँ-बाप ने सिखाया……मगर
हमारे ख्वावों को पंख दिए हैं आपने… जीतने को पूरा आसमां
हमारी जीत पर उछलते देखा है आपको …
हमारी हार पर अपनी उदासी छुपाये
हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है आपने
हमारी भावनाओं को शब्द दिए हैं आपने
हमें डांटने के बाद मायूस देखा है आपको….
जब हम अपने लक्ष्य से भटकते हैं और आप हमें सुधारने के लिए हमारी गलतियों पर डांट देते है या गुस्सा होते हैं तो हम बुरा मान जाते हैं। हमें लगता है कि आप हमारे प्रति कठोर हैं…
मगर हम बाद में जान पाते हैं कि उस दिन आपका लंच बॉक्स नहीं खुलता; आपके चेहरे पर साफ़ नजर आती हैं मायूसी की लकीरें,,,,तब हमें एहसास होता है कि हम से ज्यादा आप दुखी होते हैं।
DEAR TEACHERS,
आज न तो माफ़ी मांगने का दिन है ,,,,,और न डांट खाने का। आज आपसे आशीर्वाद लेने का दिन है। आज आपसे आशीर्वाद लेकर आपसे वादा करने का दिन है। हम आपसे वादा करते हैं आपके मार्गदर्शन में जीत लेंगे आसमान। … पूरे करेंगे अपने सपने और आपके लक्ष्य।
आपके आज्ञाकारी शिष्य……
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