मंगलवार, 4 अगस्त 2015

खुद को रचकर

खुद को रचकर दुनियां को कुछ अपने ढंग से रंगते हैं..
कहीं मटमैली - कहीं रंगोली सी एक इबारत लिखते हैं..
कुछ तो रोशन होंगी रातें, चल आसमान में चमकते हैं..
कुछ तो तककर राहत लेंगे, चल तारों संग टंगते हैं.
अपना क्या है कुछ भी चुन लें,
चल सपनों की वादी चुनते हैं

आवारा हैं कोई धुन लें,
चल बेताबी बुनते हैं..
नज़रों से कुछ दूर तो क्या,
हम सपने बनकर जागते हैं.
हम हैं राही प्यार में कुरबां,
चल कुछ लम्बी दूरी चलते हैं..

मंगलवार, 3 मार्च 2015

घर से दूर होली

आज होली का त्यौहार है, और मैं पिछले कई बार की तरह इस बार भी घर नही जा पाया। त्योहारों पर घर ना जाने का सिलसिला पिछले कुछ दिनों से निरंतर बना है, और ये सिलसिला न जाने कब आदत बन गया पता ही नही चला।  हर बार की तरह इस बार भी कोई खास कारन नहीं है न जाने का।  बल्कि मैं  खुद ही कोई न कोई अच्छा सा बहाना बना लेता हूँ. और एकाध पूछने वालों को वही पकड़ा देता हूँ. वैसे भी पूछने वालों की संख्या ज्यादा नहीं है.
            ज़िंदगी ने इस शहर में एक अरसा भी नहीं काटा, मगर न जाने कब ये शहर मेरे भीतर उतर गया. यहाँ की खुश्बू की पकड़  मुझे छोड़ती ही नहीं। जब भी गया हूँ इस शहर से सुकून से नहीं जा पाया हूँ. एक अजीब सी टीस हमेशा बसी रही है .
 हर बार इलाहबाद रेलवे स्टेशन छोड़ते वक़्त लगता है जैसे मैं अपना वजूद यहीं छोड़कर  रहा हूँ. और घर पहुँचते पहुँचते एक नया वजूद ओढ़ लेता हूँ. फिर वहाँ से मां के लाख मना करने के बाबजूद उस रूह को वहीं उतारकर चल देता हूँ.
इस बीच सफर में मैं किसी जगह के वजूद में  नहीं रहता.., एकदम कोरा सा बैठा रहता हूँ.

रविवार, 15 फ़रवरी 2015

ट्रेन के जनरल संदूक में..

ट्रेन में सफ़र मेरे लिए हमेशा एक संघर्ष की तरह रहा है. एक ऐसा संघर्ष जो बिना किसी मुकम्मल मंजिल के एक्स्ट्रा सा लगता है. ये वो संघर्ष है जो मेरे सफ़र में जानबूझकर भर दिया जाता है. जिस मंजिल पर पहुँचने के लिए आरंभिक लाइन तक पहुँचने के लिए सबको बाइज्ज़त एक सीट मिलती है, मुझे न जाने क्यूँ अपना संघर्ष यहीं से शुरू करना पड़ता है. यहीं से मेरे साथ भेदभाव की राजनीति शुरू हो जाती है.
ट्रेन के जनरल डिब्बे से मुझे एतराज नहीं है. मगर वहाँ लोगों की घुटन कचोटती है, हमेशा जितने लोग जनरल बोगी में भरे रहते हैं बमुश्किल उतने ही बाकी डिब्बों में आरम् से लेटे होते हैं. मुझे उनके आराम से सोने से समस्या नहीं है. समस्या है इस दोहरे बर्ताब से कि आधी आबादी को पैर रखने को जगह नहीं नसीब. घंटों लटके जाना पड़ता है.
रेल बजट पेश होने वाला है. अक्सर चार जनरल डिब्बों में भरी भीड़ के बराबर लोग बाकी के बीस डिब्बों में सफर कर रहे होते हैं. ये औसत हैरान करता है और सवाल भी उठाता है कि क्या समानता की बड़ी-बडी बातें सिर्फ किसी प्रस्तावना में लिखे आदर्श वाक्य बनकर रह गयीं हैं. 
अपनी जान जोखिम में डालकर पायदानों पर लटके मजबूर लोगों को भी आशा है कि उन्हें कम से कम भीतर खड़े रहने की जगह तो मिल ही जायेगी. यू.पी-बिहार से बड़े शहरों को चलने वाली रेलगाड़ियों के स्लीपर के फर्श पर बैठे और जनरल बोगियों के शौचालयों में भरे मासूमों को इतनी उम्मीद तो होगी ही कि रेलमंत्री के सूटकेस में उनके घुटन और बदबू से बचाने की एकाध योजना तो होगी. मुंबई, अहमदाबाद और दिल्ली से आने-जाने वाली रेलगाड़ियों में जनरल बोगियां बढाई जाएँ या फिर गाड़ियों की संख्या में वृद्धि हो. 

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

तेरे हिस्से का वक़्त...


"जिसने वक़्त को नही समझा वो हमेशा हारा है " ये पंक्ति किसी महानुभाव ने किसी ज़माने में लिखी होगी , मगर इसका सिक्का ऐसा जमा कि हर कोई भयभीत रहने लगा। और सबने वक़्त को कैद करना चाहा।  लेकिन जब बुद्धिमानों की समझ में ये आया कि "वक़्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता।" तो फिर हार मानने की  बजाय वक़्त को बाँट दिया।  पहले सालों में , महीनों में , हफ़्तों में ,दिनों में ,घंटों में ,मिनटों में  फिर सेकण्डों में और अब तो सेकण्ड के भी हजारों हिस्से कर दिए गये हैं। मगर फिर भी वक़्त है कि  हाथ ही नहीं आता.

यूँ तो ये वक़्त दिनभर सरपट दौड़ता रहता है, सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती। मगर जैसे ही शाम होती है , तो सूरज के साथ वक़्त भी ढलने लगता है और रात होते होते ठहर सा जाता है। लगता है जैसे इसके साथ ही मेरी साँसे भी ठहर जाएंगी। मैं हर शाम से देर रात तक तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ , जब तक कि तुम सो नहीं जाते (मुझे पता है, तुम कब सोते हो ). मगर तुम नहीं आते लेकिन हाँ तुम्हारे हिस्से का वक़्त जरूर चला आता है,,,,एक घने कोहरे की  चादर ओढ़े।  और फिर वही दिनभर सरपट दौड़ने वाला वक़्त इत्मिनान से सुस्ताता  है , लगता है जैसे घड़ी की सुइयाँ बर्फ़ सी जम गईं हैं और उन्हें अलाव की  जरूरत है। 
 आजकल दिन छोटे और रातें बहुत लम्बी होने लगीं हैं। 


तू मेरी ज़िंदगी में शामिल नहीं है लेकिन …
तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तन्हा गुजरता है।

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

मीडिया की चुप्पी

'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी'  यानी दुनियां कि सबसे बड़ी मूर्ति के तौर पर घोषित की गयी सरदार पटेल की प्रस्तावित मूर्ति की आधारशिला गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रख दी है.
याद  करें, एक अरसा पहले उत्तरप्रदेश की तत्कालीन  मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में महापुरुषों की मूर्तियां स्थापित करने को लेकर मीडिया की भूमिका किस हद तक आलोचना से भरी थी, टीवी स्टूडियो में प्रतिष्ठित विशेषज्ञों की कभी न खत्म होने वाली अनगिनत बहसों में लब्बोलुआब यही रहता था कि मायावती इतना पैसा इन मूर्तियों में खर्च करने की बजाय अगर स्कूलों और अस्पतालों के निर्माण में लगातीं तो प्रदेश का कल्याण होता . जनता का पैसा सही ठिकाने लगता.
फिर  आज एक मुख्यमंत्री की राजनैतिक तरक्की के लिए इतने बड़े पैमाने पर खर्च हो रहे पैसे पर मीडिया चुप क्यों है?
मायावती की कई दिनों तक टांग खींचने वाला मीडिया इसमें पैसे कि बर्बादी देख रहा था. और तब यही मीडिया सरकार को पैसा जनहित में खर्च करने की तमाम योजनाएं सुझा रहा था,
यह प्रस्तावित मूर्ति अमेरिका स्थित 'स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी' से दुगुनी होगी और रूस के रियो-डी-जेनेरियो स्थित ईसा की मूर्ति से चार गुना लंबी होगी .