गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

चल पड़े हों ये कदम..

चल पड़े हों जिस तरफ भी,
ये कदम फिर ना डिगें.

फासला कितना भी हो,
मंजिल से पहले ना रुकें..
हौसला दिल में हो इतना,
मुश्किलों से ना डरें..
ठोकरें खाकर उठें फिर,
मन में निराशा ना भरें...
मंजिलें तकती हैं राहें,
चल चला साथिया...!

रविवार, 8 नवंबर 2015

दूसरों से मांगने से पहले

दूसरों से मांगने से पहले
जितने मेरे खुद के हक है
उन्हें खुद से लड़कर पाना है
अपने नाम के सारे ख़िताब
अर्जित करूँगा मै ........
अपने अस्तित्व की पहचान में
चमकते सितारों में
भरनी है रौशनी हर पल ...
किसी और से उम्मीदें पालने से पहले
चुकता कर लूं खुद से हिसाब .........!

बुधवार, 2 सितंबर 2015

भूख और माँ का गहरा रिश्ता

जब भी भूख लगती है तो माँ याद आ जाती है 
सिर्फ इसलिए नहीं कि पेट भर देती थी..
       बल्कि कई बार इसलिए कि 
        जब खाना नहीं होता था घर में 
        तो ऐसे बहला देती थी 
        जैसे भूख सोख ली हो पेट से 
और भूख और माँ एक हो गए हों..

कभी कभी बिना गलतियों के ही चिडचिडा उठती थी, डंडा लेकर 
ताकि मैं भाग जाऊं रूठ कर दिनभर के लिए 
और खेलता रहूँ उन गलियों में 
जहाँ भूख का जाना प्रतिबंधित था.

लेकिन कभी उसने मुझे रसोई की तरफ झाँकने भी नहीं दिया..

आजकल जब लौटता हूँ भूख से तैश होकर 
और कमरे की रसोई टटोलकर कुछ नही पाता हूँ
तो, पेट में आग लग जाती है..
 तब फिर माँ याद आती है कि कितनी बड़ी मनोवैज्ञानिक थी 
जानती थी कि 
               खाली बर्तन देखकर भूख असहनीय हो जाती है..

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

खुद को रचकर

खुद को रचकर दुनियां को कुछ अपने ढंग से रंगते हैं..
कहीं मटमैली - कहीं रंगोली सी एक इबारत लिखते हैं..
कुछ तो रोशन होंगी रातें, चल आसमान में चमकते हैं..
कुछ तो तककर राहत लेंगे, चल तारों संग टंगते हैं.
अपना क्या है कुछ भी चुन लें,
चल सपनों की वादी चुनते हैं

आवारा हैं कोई धुन लें,
चल बेताबी बुनते हैं..
नज़रों से कुछ दूर तो क्या,
हम सपने बनकर जागते हैं.
हम हैं राही प्यार में कुरबां,
चल कुछ लम्बी दूरी चलते हैं..

मंगलवार, 3 मार्च 2015

घर से दूर होली

आज होली का त्यौहार है, और मैं पिछले कई बार की तरह इस बार भी घर नही जा पाया। त्योहारों पर घर ना जाने का सिलसिला पिछले कुछ दिनों से निरंतर बना है, और ये सिलसिला न जाने कब आदत बन गया पता ही नही चला।  हर बार की तरह इस बार भी कोई खास कारन नहीं है न जाने का।  बल्कि मैं  खुद ही कोई न कोई अच्छा सा बहाना बना लेता हूँ. और एकाध पूछने वालों को वही पकड़ा देता हूँ. वैसे भी पूछने वालों की संख्या ज्यादा नहीं है.
            ज़िंदगी ने इस शहर में एक अरसा भी नहीं काटा, मगर न जाने कब ये शहर मेरे भीतर उतर गया. यहाँ की खुश्बू की पकड़  मुझे छोड़ती ही नहीं। जब भी गया हूँ इस शहर से सुकून से नहीं जा पाया हूँ. एक अजीब सी टीस हमेशा बसी रही है .
 हर बार इलाहबाद रेलवे स्टेशन छोड़ते वक़्त लगता है जैसे मैं अपना वजूद यहीं छोड़कर  रहा हूँ. और घर पहुँचते पहुँचते एक नया वजूद ओढ़ लेता हूँ. फिर वहाँ से मां के लाख मना करने के बाबजूद उस रूह को वहीं उतारकर चल देता हूँ.
इस बीच सफर में मैं किसी जगह के वजूद में  नहीं रहता.., एकदम कोरा सा बैठा रहता हूँ.