शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

तू न रुकना, रुक जाएँगी सारी मुश्किलें..

मंजिलें परछाईं बनकर चल रही हैं
कोशिशें अपनी ये हर पल तक रहीं हैं.
बस दौड़ता चल वक्त कम है, सांस लेने के लिए
खींचता जा तू लकीरें, आने वालों के लिए
मुश्किलें हैं ही नहीं, सब कुछ नया है.
ठोकरें भी हमको देतीं, एक दुआ है
चल चला चल हाथ पकडे
मैं साथ हूँ, अंजाम तक रे
हिम्मतें परखेंगे तेरी, सपने तेरे...
चाहतें होंगी बढाती, कदम तेरे..

तू न रुकना, रुक जाएँगी सारी मुश्किलें..
ठोकरें काबिल नहीं कि पा लें मंजिलें..

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

आतंकवाद के खिलाफ सराहनीय पहल

मुस्लिम संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिए-ए-मुशाविरत ने पहल की है की वे मस्जिदों, मदरसों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में आइएस के खिलाफ लोगों को आगाह करेंगे.
ऐसी पहल सराहनीय हैं क्योंकि धर्म के नाम पर इंसानियत का खात्मा किसी धर्म की किताब में नहीं है, मगर कुछ तथाकथित संगठन इसे दुष्प्रचारित कर इतना कट्टर बना देते हैं, कि धर्म ही लोगों की जान का प्यासा बन जाता है.
असल में ऐसी पहलें इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि यदि कोई अन्य धर्म का संगठन या व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे धर्म विरोधी करार दिया जाता है. अब जबकि उसी धर्म के ही शिक्षक इस्लाम का असल मतलब बतायेंगे तो उस धर्म के मानने वाले लोग अपने धर्मगुरुओं पर भरोसा भी करेंगे और समर्थन भी मिलेगा.नई पीढ़ी का भटकाव कम होगा और ऐसे कट्टर संगठनों की कमर टूटेगी.
कुछ दिनों पहले प्रमुख मस्जिदों के मौलवियों ने भी आइएस के खिलाफ ख़त जारी कर इसे इस्लाम के खिलाफ बताया था. ये धर्मगुरुओं की सामाजिक जिम्मेदारी बनती है कि अगर कोई संगठन धर्म को खतरनाक बना रहा है तो उसके खिलाफ आगे आकर अपनी आवाज बुलंद करें. क्योंकि समाज ने धर्म की रक्षा के साथ-साथ मानवता की भी अहम जिम्मेदारी इन्हें सौंपी है. धर्म के ऐसे गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए जब धर्म रक्षक आगे बढ़कर आएगे, तो उनकी बात भी सुनी जाएगी और लोग दुष्प्रचार का विरोध करने की हिम्मत भी जुटा पाएंगे.
आतंकवाद की जड़ें धर्म में दबी हैं, तो धार्मिक स्तर पर ही उन्हें उखाड़ा जा सकता है. आतंकवाद धर्म की गलत परिभाषाओं से उपजी समस्या है. अगर उन्हीं परिभाषाओं को सही रूप में पढाया जाए तो कम से कम आने वाली पीढ़ी में जहर की जगह सौहार्द्य भाव की उम्मीदें की जा सकती हैं. 
आई एस की गर्त में जा चुके लोगों के सुधरने की गुंजाइस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण नई पीढ़ी को इसमें भर्ती होने से रोकना है. पूरी दुनियां में जाल फैला चुका यह खतरनाक संगठन युवाओं को धर्म के नाम पर इंटरनेट के जरिये फंसा रहा है. असल में युवाओं के फंसने की वजह ये भी है कि उन्हें जो ऐसे संगठनों द्वारा बताया जा रहा है, उसे वे इसलिए भी सही मान रहे हैं क्योंकि दूसरी तरफ से सब चुप हैं. इसके विरोध में जो हैं भी, वे दूसरे धर्म के हैं. पिछले दिनों पुलिस ने एयरपोर्ट से जिस युवक को गिरफ्तार किया, उसे भावनात्मक रूप से जीवन झोंकने के लिए उकसाया गया था. उस जैसे हजारों युवा भडकाव में बहे जा रहे हैं. जिन्हें बचाने की जिम्मेदारी धार्मिक समाज की है. 
असल में धर्म के नाम पर ऐसे आतंकवादी संगठन जो खतरनाक खेल खेलते हैं, उसके बदले में उस धर्म के मासूम लोग निशाना बनते हैं. पूरी दुनियां में मुस्लिमों को जिस तरह का बर्ताव झेलना पड़ता है, उसका गुनाह उनमे से शायद किसी ने नहीं किया होता, मगर उस धर्म के नाम पर जो आतंकवादी संगठन करते हैं उसकी चपेट में बेगुनाह लोग आतंकवादी की तरह देखे जाते हैं.
यह लेख दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हो चुका है 



गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

परम्पराओं की दुहाई में समानता का हनन

महाराष्ट्र के शनि-शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश न देने के लिए हज़ारों साल प्राचीन परंपरा की दुहाई दी जा रही है. किसी भी नियम के प्राचीन होने का तर्क देकर उसे मानने की बाध्यता नहीं थोपी जा सकती। इतिहास गवाह है कि हर धर्म में समय-समय पर सामाजिक सुधार होते रहे हैं।  हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि धर्म लोगों के जीवन में बाधा नहीं बनता बल्कि विकास की संभावनाएं उजागर करता है.

देश कालांतर में अनेक बदलावों से गुजरा है, और तब समय और समाज के अनुरूप परम्पराएँ भी बनी-बिगड़ी है. जिसमें सती प्रथा से लेकर झाड़ फूँक जैसे अंधविश्वासों पर रोक लगी है.तत्कालीन परिवर्तन आजादी के बाद का है, जहां हमने सर्वसम्मति से संविधान के अनुसार परम्पराएँ लिखित रूप में निर्धारित कर लीं हैं. अब जबकि संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 में लिंग के आधार पर धार्मिक विभेदीकरण निषेध है, तो फिर कौन सी परंपरा को बचाने के लिए हम महिलाओं को धार्मिक स्थलों से दूर धकेल रहे हैं. और अगर उस हज़ार साल पहले की परंपरा को बचा रहे हैं तो दूसरी ओर संवैधानिक नियमों को भी तो तोड़ रहे हैं, जिसके अनुरूप हमारा देश चल रहा है.

सदियों से हमने आधी आबादी को प्रतिबंधित कर बहुत कुछ खोया है. अगर उन्हें भी बराबरी पर चलने का मौका दिया जाता तो दुनियां दोगुनी आगे होती। मगर हम हमेशा उनके रास्ते में रोड़े डालते रहे, तमाम तरह के नियम-कानून और परम्पराएँ गढ़ते रहे ताकि वे दुनियां में अपना योगदान न कर पाएं। सोचिये अगर उन्हें बांधने की जगह कंधे से कन्धा मिलकर चला जाता तो हम सदियों आगे होते और आज हज़ारों साल पहले की इस परम्परा में उलझकर एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले नहीं बैठे होते।


यह लेख हिन्दुस्तान में प्रकाशित हो चुका है.

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

जिंदा हो अभी

याद रखो..
तुम ज़िंदा हो अभी !
तुम्हारी साँसे अभी चल रहीं हैं 
और दौड़ रहा है रंगों में खून..
कुछ भी करने की सारी संभावनाएं 
बाकी हैं अभी....
उठो और साबित करो
कि तुम अभी मरे नहीं हो...!

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

नववर्ष कुछ यूं आए

जीवन में सच्चाई लेकर
खुशियों की अंगडाई लेकर
बागों की अमराई लेकर
बार-बार शहनाई लेकर
ये साल आपके जीवन में आए लाख बधाई लेकर..
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मंजिलों पर अब हक हो अपना
खुद ही लिख लें अपना सपना
जीना अब अपने ख्वावों को
दिल में इश्क-खुदाई लेकर...
ये साल आपके जीवन में आये लाख बधाई लेकर....
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कोशिश अब परिणाम में बदलें
जो कदम बढे अंजाम में बदलें
कोई साथ ना दे तो रुक ना जाएँ
चलें संग परछाई लेकर.....
ये साल आपके जीवन में आये लाख बधाई लेकर....
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हर क्षण को इतिहास बना दें
मुश्किल को उपहास बना दें
चुनौतियों से ऐसे खेलें
कि चिंता जाए विदाई लेकर....
ये साल आपके जीवन में आये लाख बधाई लेकर....
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भरकस जीना हर एक पल को
भूल जाएँ हम मौत के डर को
जीवन को जीना सिखला दें
अमिट नयी ऊँचाई देकर....
ये साल आपके जीवन में आये लाख बधाई लेकर....
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नए वर्ष में आपके अद्भुत जीवन की कामना करते हुए समर्पित मेरे शब्द..
नववर्ष की ढेरों शुभकामनाएं सहित..!