सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

सरकार की साजिश

पूरा देश आक्रोश और विद्रोह की आग से भरा हुआ है. स्व-घोषित देशभक्त सड़कों पर उतरकर देशद्रोहियों को देश से बाहर खदेड़ने के लिए आंदोलन कर रहे हैं. पुलिस गिरफ्तारियां कर रही है. कोर्ट पेशी को आने वाले आरोपियों को सुरक्षा देने में लाचार है. देशद्रोह के आरोपी खुद को देशभक्त बताने के लिए राष्ट्रवाद की परिभाषाएं लिख रहे हैं. इन सबके बीच सरकार चुप है. सरकार जनता को देशभक्ति के नाम पर लडाकर चुप्पी साधे देख रही है. उसका काम सिर्फ इतना है कि कभी-कभार ये आग मंद पड़ती भी है तो उसमें हाफिज सईद का हाथ होने का सुराग देकर घी डाल देती है. हमें समझना होगा कि हमें अहम सवालों पर सोचने से हमारा ध्यान भटकाने की ये सरकार की सोची-समझी चाल है. हम इधर लड़ मर रहे हैं उधर बैंको के लाखों करोड़ रूपयों के कर्ज डूब गए. बजट सत्र आने वाला है जिसमें बजटों से उम्मीदों पर बातें करने का हमें वक़्त ही नहीं दिया जा रहा.
एन. एस. एस. ओ. की अरसठवीं रिपोर्ट में बेरोजगारी का स्तर बढ़ गया है, लेकिन हमें देश-भक्ति की आग से फुर्सत लेने दी जाए तब तो हम सोचेंगे कि अच्छे दिन कब आयेंगे. हमें सवाल उठाने की समझ ही पैदा नहीं होने दी जा रही. देशभक्ति का सवाल ही इतना अहम बना दिया गया कि इसके आगे सब कुछ तुच्छ है. जरा सोचिए कि अगर इस होड़ में देशभक्ति का सर्टिफिकेट मिल भी गया तो क्या देशभक्त भुखमरी और बेरोजगारी से नहीं मरेंगे. 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

खबरों की खतरनाक जल्दबाजी

टीवी चैनलों में ख़बरों को परोसने की जल्दबाजी खतरनाक होती जा रही है. जे एन यू मामले में एक वीडियो की बिना जाँच-पड़ताल किए देश में विद्रोह का माहौल बना दिया गया. और तो और कई दिनों तक एंकर चिल्ला-चिल्ला कर दर्शकों में आक्रोश पैदा करते रहे. लग रहा था जैसे देश से आह्वान कर रहे हों कि वक्त आ गया है उठ खड़े होने का. देश में ही दो खेमे बाँट दिए गए. इसे टी आर पी कहेंगे या जल्दबाजी की होड़. सवाल यह है कि क्या वे अपनी देशभक्ति साबित कर रहे थे या लोगों को देशद्रोह का सर्टिफिकेट बाँट रहे थे. 
ये पहली बार नहीं हुआ है इससे पहले भी नेपाल-भूकंप जैसी गंभीर घटनाओं के दौरान भी जल्दबाजी में भी ऐसी खबरें बनाईं गयीं. ऐसी जल्दबाजी वाली उडती-उडती ख़बरें तो सोशल मीडिया या फोन से सबको पता चल ही जाती हैं, तो फिर लोग क्यों मीडिया के पास जाए. लोग अखबार या टीवी चैनल इसलिए खोलते हैं ताकि ख़बरों की विश्वसनीयता और सही नजरिए से देख सकें. इस भडकाव भरे सलीके के लिए तो व्हाट्स एप और फेसबुक बेहतर हैं. फिर मीडिया की आवश्यकता क्या रहेगी.

मीडिया को अपनी भूमिका तय करनी होगी वर्ना लोग टीवी देखना बंद कर देंगे. बिना सत्य-तथ्य की जाँच किए महज ख़बरें परोसकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाडना खतरनाक हो सकता है. मीडिया का काम सिर्फ ख़बरें देना नहीं है, खबरों से समाज की दिशा और दशा तय करना भी है. 

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

परम्पराओं की दुहाई में समानता का हनन

महाराष्ट्र के शनि-शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को प्रवेश न देने के लिए हज़ारों साल प्राचीन परंपरा की दुहाई दी जा रही है. किसी भी नियम के प्राचीन होने का तर्क देकर उसे मानने की बाध्यता नहीं थोपी जा सकती। इतिहास गवाह है कि हर धर्म में समय-समय पर सामाजिक सुधार होते रहे हैं।  हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए कि धर्म लोगों के जीवन में बाधा नहीं बनता बल्कि विकास की संभावनाएं उजागर करता है.

देश कालांतर में अनेक बदलावों से गुजरा है, और तब समय और समाज के अनुरूप परम्पराएँ भी बनी-बिगड़ी है. जिसमें सती प्रथा से लेकर झाड़ फूँक जैसे अंधविश्वासों पर रोक लगी है.तत्कालीन परिवर्तन आजादी के बाद का है, जहां हमने सर्वसम्मति से संविधान के अनुसार परम्पराएँ लिखित रूप में निर्धारित कर लीं हैं. अब जबकि संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 में लिंग के आधार पर धार्मिक विभेदीकरण निषेध है, तो फिर कौन सी परंपरा को बचाने के लिए हम महिलाओं को धार्मिक स्थलों से दूर धकेल रहे हैं. और अगर उस हज़ार साल पहले की परंपरा को बचा रहे हैं तो दूसरी ओर संवैधानिक नियमों को भी तो तोड़ रहे हैं, जिसके अनुरूप हमारा देश चल रहा है.

सदियों से हमने आधी आबादी को प्रतिबंधित कर बहुत कुछ खोया है. अगर उन्हें भी बराबरी पर चलने का मौका दिया जाता तो दुनियां दोगुनी आगे होती। मगर हम हमेशा उनके रास्ते में रोड़े डालते रहे, तमाम तरह के नियम-कानून और परम्पराएँ गढ़ते रहे ताकि वे दुनियां में अपना योगदान न कर पाएं। सोचिये अगर उन्हें बांधने की जगह कंधे से कन्धा मिलकर चला जाता तो हम सदियों आगे होते और आज हज़ारों साल पहले की इस परम्परा में उलझकर एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले नहीं बैठे होते।
यह लेख दैनिक ट्रिब्यून के जनसंसद में प्रकाशित हुआ है.

सरेआम पिटते पत्रकार

पटियाला हॉउस कोर्ट परिसर में 15 फरवरी को वकीलों ने कवरेज को गए पत्रकारों के साथ मारपीट की और उन्हें कोर्ट परिसर से बाहर निकाल दिया. मामला जे एन यू मे हुए देशविरोधी कार्यक्रम और देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार जे एन यूं के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान हुआ जब कुछ वकीलों और भाजपा नेताओं ने जे एन यू छात्रों पर देश के गद्दार होने का आरोप लगाते हुए हमला बोल दिया. बात यहीं तक नहीं रुकी हमलावरों ने पत्रकारों को भी देशद्रोही घोषित कर दिया और मारपीट शुरू कर दी.
हमला करने वाले कोई अनपढ़ लोग नहीं थे, वकीलों ने इस घटना को अंजाम दिया है. जो कि सबसे बडी चिंता का विषय है. वकील कोर्ट के दरवाजे पर ही खुद जज बनकर सजा देने लग जायेंगे तो देश में न्याय का हश्र क्या होगा? हमारे देश में आतंकवादियों का मामला भी देश के ही वकील लड़ते हैं. तब भी दोनों पक्षों की बात ध्यानपूर्वक सुनी जाती है. कोर्ट के लिए तो आरोपी भी तब तक बराबर है जब तक उस पर अपराध सिद्ध नहीं हो जाता.


कोर्ट परिसर में ऐसी घटनाओं को अंजाम देना न्यायपालिका पर आम जन की विश्वसनीयता पर भी एक सवाल बन गया है. जब दूसरे पक्ष के छात्रों सहित पत्रकारों पर भी हमले होते हैं तो कोई आम आदमी कैसे अपने सुरक्षा की आस लगा सकता है. 
न्यायपालिका को मामला अपने संज्ञान में लेकर सख्त कदम उठाने होंगे. मामला कोर्ट परिसर में हुआ है इसलिए अत्यंत आवश्यक है कि दोषियों को कड़ी सजा देकर आम जन को आश्वस्त करे कि वे कोर्ट से सुरक्षित न्याय की गुहार लगा सकते हैं.


असल में ये हमला देश के लोकतंत्र पर हमला है जहाँ इसके चौथे स्तंभ के विरोधी विचारों पर सरकार हमला करेगी तो पहले से ही हताहत स्तंभ गिरने में वक्त नहीं लगेगा. देशभक्त होने का मतलब कभी भी सरकार समर्थक होना नहीं रहा. हमेशा मीडिया आलोचनात्मक रवैया अपनाती ही है, आपातकाल के दौरान भी मीडिया ने खतरे उठाकर सरकार के विरोध में जमकर लिखा है. लेकिन इस वक्त तो वैसे ही गिने-चुने पत्रकार मुखर होकर लिख-बोल पा रहे हैं और अगर उन पर भी हमला कर देशद्रोही घोषित कर दिया जायेगा तो फिर सब ऐसे देशभक्त पत्रकार बचेंगे जो सरकार के भक्त होंगे.
यह लेख जनसत्ता, हिंदुस्तान, दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हो चुका है. 

रविवार, 14 फ़रवरी 2016

इश्क तो बस इश्क है....


“वो कभी साथ-साथ नहीं बैठे... उन्होंने कभी हाथों में हाथ लेकर कोई लंबी सैर नहीं की.. कॉलेज की सीढ़ियों पर बैठकर कभी जरूरी बातों के लिए भी वक़्त नहीं निकल पाए.. एक दूसरे से मिलने पर डर और शर्म की हलकी चादर हमेशा दोनों के बीच एक दीवार बनकर खडी रही... कुछ ही फासलों पर रहकर कभी एक दूसरे से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए... करीब से गुजरे तो रोंगटे खड़े हो गए और बडी दूर से जुटाई गयी बोलने की हिम्मत पास आकार सिर्फ हल्की मुस्कुराहट में सिमट गयी...
.....मगर दोनों एक पल के लिए भी एक दूसरे के मन से ओझल नहीं हुए.. हमेशा स्मृतियों में एक स्थाई वजूद लिए मौजूद रहे... गैर-मौजूदगी में एक एहसास बनकर साँसों में घुलते रहे.. आसपास रहकर सुकून भरी खुशबू की तरह महकते रहते... और एक दूसरे की ताकत बनते रहे.. किसी महफ़िल में दो कोनों से आँखों की तिरछी कनखियों से एक दूसरे को चुपके-चुपके निहारते रहे.. जब नज़रें मिलती तो सहम कर झुक जातीं रहीं..!" 


प्रेम और दोस्ती में एक बड़ा फर्क अभिव्यक्ति के मामले में भी होता है. जब हम प्रेम में होते हैं तो जुबां से शब्द नहीं निकलते वहीं दोस्ती में खुद को बढा-चढा कर पेश करने में आगे होते हैं. प्रेम में हम सामने वाले से बिना कहे समझने की आरजू पाले होते हैं. बहुत कुछ कहना नहीं चाहते. सामने वाले को इजाजत देते हैं कि वो हमारा जेहन पढे, हमें महसूस करे. चेहरे की शिकन देखकर परेशानी का अनुमान लगा ले. चुप्पियों को सुनकर हादसों की कहानी जान ले. आँखों को पढकर चाहतें पढ़ ले....
हमारा समाज ही ऐसा है जहां कभी प्रेम में पूर्णता नहीं रही... हमेशा एक अधूरापन कसक बनकर खटकता रहा.. जो सोचा वो पहले तो खुद के डर और शर्म से पर्दों में छुपा रहा फिर कभी घर-परिवार के डर से, कभी समाज के डर से हकीकत की चादर नहीं ओढ़ पाया.. 
वो हजारों अधूरी ख्वाहिशें मन से स्याही की रेखाओं में कागज पर उतरती रहीं.. वही जब किसी ने पढीं तो नज़्म बन गईं..

मगर क्या करें ? ये उम्र ही ऐसी है, जिसमे सपने देखने की अपार शक्ति होती है, कितनी बंदिशों के बाबजूद हजारों ख्वाहिशे पलती रहती हैं हर पल.. बिना ये सोचे कि इन्हें पाना बहुत मुश्किल है.. आँखे सपनों का घर बन जाती हैं.. और फिर प्रेम की ऊर्जा तो सोचने की सारी सीमाएं ही तोड़ देती है.. कल्पनाओं का ऐसा संसार बनता है कि धरती की बजाय आसमां पे आशियाँ होता है.. चाँद-तारे उपहार बन जाते हैं.. और हसीन वादियाँ मुहब्बत की सैर...
 और उन वादियों में बैठकर बरबस फूट पड़ता है---
    "क्षण भर तुम्हें निहारूं 
    अपनी जानी एक एक रेखा पहचानूँ 
  चेहरे की, आँखों की .. अंतर्मन की
और हमारी साझे की अनगिनत स्म्रतिओं की "
मगर यही सब जब वास्तविक दुनियां में नामुमकिन सा होता है.. तो फिर कई बातें जुबां तक आते आते रुक जाती हैं.. अधूरी ख्वाहिशें मन में मसोसे जीते रहते हैं...
मगर बड़ी खूबसूरत बात है कि शायद ये अपूर्णता ही हमे और ज्यादा करीब ले जाती है.. सब कुछ पा लेना और संतुष्ट हो जाना ही जीवन का सार नहीं है.. अतृप्त इच्छाएँ एक नई ऊर्जा का संचार करती हैं और एक आग लगी रहती है चाहत की.. जहां कभी गुलज़ार के गीत एक खूबसूरत दुनियां में ले जाते हैं तो जगजीत सिंह की कोई गज़ल एक मीठी चुभन की तरह जेहन में उतर जाती है.
यही तो वो तड़प है जो प्रेम को अनमोल बना देती है. यही है वो आग का दरिया जिसे पार करने वाला महान हो जाता है... यहीं से उपजती हैं वो हजारों भावनाएं जिन्हें शब्द दे पाना लगभग नामुमकिन होता है.. कसक और तड़प के बीच महसूस की जाने वाली अनुभूतियाँ कभी कागज पर नहीं उतर पायीं... फिर मुहब्बत की कविता का देवता कीट्स भी यही कह पाता है-   
"जो सुना गया वह मधुर था.. जो अनसुना रहा वह और भी ज्यादा मधुर .."



पाने की लालसा और जद्दोजहद मंजिल के सफर को रोचक बना देती है, पा लेना एक विराम है. जिसके बाद वहीं खड़े रहना होता है, ज़िंदगी में स्थिरता आ जाती है. और जीवन एक संतोष भरा बन जाता है, फिर कोई चाहत नहीं.. जेहन में कोई हरारत नहीं रहती..
उसकी तुलना में पाने की चाहत में दौड़ते रहना एक गतिशील क्रिया है जिसमे हर पल कुछ न कुछ नया घटता रहता है.. कभी खोने का डर तो कभी एक झलक पा लेने की खुशी ज़िंदगी में रोमांच बनाये रखती है.. एक पल में सारा जहान अपना लगता है,,, तो दूसरे ही पल सब कुछ मुट्ठी से रेत की तरह फिसलता नज़र आता है.. मगर फिर भी इस अनुभव को ज़िंदगी भर जीते रहने के लिए गुज़ारिश है-
"इच्छा करने में जो सुख है, सबकुछ पाने में प्राप्त कहाँ,
  मैं तुमसे मांगू, तुम दाने-दाने को तरसाती जाओ.."


तुम पास रहो  न रहो, बस तुम्हारे साथ होने का एहसास मात्र मेरे भीतर के तुम्हारे चेहरे जैसी एक तस्वीर बनाये रखता है.. लगता रहता है मेरे वजूद में एक ऊर्जा की लौ जल रही है.. हर पल पास न होते हुए भी मेरे अंतस में एक साये की  तरह घुली रहती हो.…मगर, बहुत  कुछ शेष है जो अभी घुल नहीं पाया है हमारे बीच.…… 

"पाने की तड़प जिंदा रखेगी तुम्हें,
                           मेरे भीतर..
हर पल ख्याल रखेगा तुम्हारा,,
                            तुम्हें खोने का डर..."