शनिवार, 1 दिसंबर 2018

गांव-गांव पोषण 'पोषण चौपाल' : स्वस्थ भारत प्रेरक की जागरूकता पहल

 ---:-पोषण चौपाल-:-
          .............गांव-गांव पोषण अभियान
Objectives:-
:- Bringing all village level front line stakeholders (Pradhan, Secretary, Kotedar, Principal of School, SHG, Rojgar sevak, ANM, ASHA, AWW etc) at one Plateform and moderate a discussion with Villagers towards Village Malnutrition free plan
:- Strengthening VHSND and support to front line workers (Chaupal would be organised on VHSND) 
:- Awareness about Health & Nutrition in easy way relating suggestions to regional resources 
:- Discussion about Services under Poshan Abhiyan and Role & Responsibilities of each one including beneficiaries
:- Nukkad Natak for awareness and engaging Audience
:- Inviting District/Block Level officials to motivate front line stakeholders
:- Chaupal ended with Poshan Shapath
:- It's an initiative of Swasth Bharat Prerak in partnership with regional NGO Kapilavastu Welfare society and supported by ICDS Department, Siddharth Nagar


कपिलवस्तु वेलफेयर सोसाइटी और जिला स्वस्थ भारत प्रेरक की जागरूकता पहल 'पोषण चौपाल' की शुरुआत बाल विकास परियोजना अधिकारी ने बर्डपुर विकास खण्ड के देवियापुर गांव से की। सिद्धार्थ नगर में कुपोषण मिटाने के लिए सीधे जन-जन से संवाद करने के लिए गांव-गांव 'पोषण चौपाल' के आयोजन में फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाकर पोषण सेवाएं देने के साथ जन-जन को जागरूक किया जा रहा है। जहां ग्रामवासियों को एक मंच पर लाकर पोषण सम्बन्धी जानकारी के साथ कुपोषण मिटाने के लिए ग्राम स्तरीय योजना बनाई जाएगी।


पोषण चौपाल को संबोधित करते हुए बर्डपुर विकास खण्ड के बाल विकास परियोजना अधिकारी संजय सिंह ने कहा कि पोषण चौपाल से पोषण का संदेश घर-घर तक पहुंचेगा। उन्होंने चौपाल में तिरंगा भोजन को समझाते हुए कहा कि स्थानीय साग-सब्जी जैसे कद्दू, गाजर, मूली, पनीर, मशरूम, दूध, घी, हरि सब्जियों से पोषण मिलता है इनका निरन्तर सेवन करते हुए सफाई का खास ख्याल रखना चाहिए। उन्होंने महिलाओं में खून की कमी के लिए आयरन की गोली या आयरन वाली चीजें खाते समय इसके साथ खट्टी चीज़ों का सेवन जरूर करने का सुझाव दिया। साथ ही उपस्थित महिलाओं से आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के सहयोग से सम्पूर्ण जांच एवं टीकाकरण जरूर करवाने का आग्रह किया।

जिला स्वस्थ्य भारत प्रेरक विनय कुमार ने पोषण चौपाल की शुरुआत करते हुए विभिन्न गतिविधियों से सीधे लाभार्थियों को जागरूक किया। इस अभियान के बारे में उन्होंने बताया कि पोषण चौपाल के जरिए पोषण अभियान के अंतर्गत सभी विभागों का कन्वर्जेन्स ग्रामीण स्तर पर सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीण स्तर पर कार्यरत सभी विभागों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाया जा रहा है जिससे गाँव के लोगों के बीच प्रधान, सचिव, कोटेदार, ए एन एम, आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता गांव को कुपोषण मुक्त करने के लिए योजना बनाएंगे। इसके साथ ही सीधे लाभार्थियों को सरल भाषा मे जानकारी दी जा रही है जिससे वे डालने आसपास के वातावरण को स्वच्छ रखकर उपलब्ध खाद्यानों से बच्चों और महिलाओं का पोषण सुनिश्चित कर सकेंगे।

पोषण चौपाल में आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ता ने ग्राम कन्वर्जेंस प्लान प्रस्तुत किया जिसपर उपस्थित प्रधान, कोटेदार, रोजगार सेवक, ए एन एम और आशा सहित  ग्रामवासिओं ने चर्चा की और महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए. साथ ही अगले महीने के लक्ष्य निर्धारित कर उसके लिए प्रत्येक प्रतिनिधि की गतिविधियां तय की गयीं।

ग्राम प्रधान सर्वेश कुमार ने कहा कि पोषण चौपाल में गांव में उपलब्ध सुविधाओं की चर्चा करते हुए  ग्रामवासिओं से सहयोग देने  को कहा. उन्होंने चौपाल में एड्स दिवस पर संक्रामक रोगों की चर्चा करते हुए जागरूक रहकर लोगों को जांच कराने को प्रेरित किया। उन्होंने ग्रामवासियों से सहयोग का आग्रह करते हुए सरकारी योजनाओं में सक्रिय भागीदारी निभाने को कहा। उन्होंने बताया कि कपिलवस्तु वेलफेयर सोसाइटी जिले के ज्यादा से ज्यादा ग्रामों में चौपाल का आयोजन करेगी।




पोषण चौपाल में स्वनीति स्पार्क एसोसिएट पीयूष चतुर्वेदी ने कहा कि सरकार आंगनबाड़ी, आशा ए एन एम के जरिए बच्चो की देख भाल करती है लेकिन पोषण के लिए सबसे पहले अभिभावकों को जागरूक होना पड़ेगा। आंगनबाड़ी, उप स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल, कोटे की दुकानों पर जाकर वहाँ अपनी सुविधाओं के बारे में पूछना होगा।

अंत में उपस्थित जन समुदाय को बाल विकास परियोजना अधिकारी ने 'पोषण शपथ' दिलाई गई।
इस अवसर पर ग्राम प्रधान, प्रधानाचार्य बलवंत चौधरी, कोटेदार, आशा, आंगनवाड़ी, सुपर वाइजर, वरिष्ठ लिपिक सुनील पांडेय, कलावती शर्मा, मो.आरिफ, उर्मिला, सुनीता, शैलेश, पुनीत जायसवाल, संतोष सहित 123 ग्रामवासी एवं बच्चे उपस्थित रहे.


शनिवार, 2 दिसंबर 2017

किसान के बेटे ने किया बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर चलाने वाले रिमोट का अविष्कार

 राजस्थान के बारन जिले के बमोरी कला गाँव में एक किसान के बेटे ने खेती के लिए गज़ब का अविष्कार किया है। योगेश नागर ने ट्रैक्टर को चलाने वाले रिमोट का अविष्कार किया है जिससे दूर बैठकर ट्रैक्टर को चलाया जा सकता है। इस अनौखे अविष्कार के साथ-साथ उन्होंने अबतक 30 अविष्कार किए हैं। इस युवा की ज़िन्दगी भी रोचक है।




योगेश नागर की दसवीं तक पढाई गांव में ही हुई। बड़ी मेहनत से पढ़ते हुए योगेश बोर्ड परीक्षा में गांव के टॉपर रहे तो आगे की पढाई के लिए पास के ही जिले कोटा चले गए। वहां 12 वीं की पढाई करते वक़्त योगेश का मन पढ़ने से ज्यादा कुछ न कुछ नया बनाने में लगा रहता था, उस समय वे आर्मी के लिए एक ऐसा वाहन बनाने में जुट गए जिसे आंधी-तूफान या अँधेरे जैसी स्थिति में कभी भी कहीं से भी चलाया जा सके, इस खोज में जुटे रहने की वजह से उनके अंक परीक्षा में कम आए लेकिन उन्होंने एक साथ कई अविष्कार कर डाले।
अब तक 30 अविष्कार कर चुके योगेश बताते है, “मैं 7 वीं कक्षा से अविष्कार कर रहा हूँ, भाप से जुड़े कई अविष्कार किए। घर की स्थिति ठीक नहीं थी तो अविष्कारों में लगने वाले सामान के लिए पैसा कम मिल पाता था। फिर भी मेरा मन कुछ न कुछ खोजने में लगा रहता है। जब भी कोई दिक्कत सामने होती है, इसे लेकर हर रात सोने से पहले सोचने लगता हूँ और कई दिनों में कुछ न कुछ नया आइडिया मेरे दिमाग में आ जाता है।”

महज 19 साल के योगेश अभी बी एस सी प्रथम वर्ष के छात्र हैं। 

योगेश के पिताजी गांव के खेतों की जुताई करने और अन्य कृषि कार्यों के लिए ट्रैक्टर चलाते हैं। खेतों की बुआई के सीजन में रात-रात भर ट्रैक्टर चलाना पड़ता है, ताकि सबकी बुआई समय पर हो। इसी तरह फसलों की कुटाई के वक़्त दिन-रात ट्रैक्टर की सीट पर ही गुजरते हैं।
घर की स्थिति बताते हुए योगेश कहते है,  “ट्रैक्टर हमने लिया था पर हमारा नहीं था। 2004 में पिताजी ने मामा की जमीन गिरवी रखकर ट्रैक्टर लोन पर लिया था। जिसकी कीमत चुकाने के लिए दिन-रात जुटे रहते थे।”

ट्रैक्टर खेतों में चलाना कई तरह की चुनौतियों से भरा होता है, लगातार ट्रैक्टर खेतों के ऊँचें-नीचे चढाव-उतराव पर चलाने से शरीर के कई हिस्सो में परेशानी होने की सम्भावना होती है।

योगेश के पिता
यही योगेश के पिताजी के साथ हुआ। लगातार ट्रैक्टर चलाने की वजह से उन्हें पेट में दर्द की शिकायत होने लगी।
“पिताजी पिछले 30 साल से ट्रैक्टर चला रहे हैं, दिन रात ट्रैक्टर की सीट पर बैठने से पेट दर्द की शिकायत हुई और डॉक्टर ने आराम करने की सलाह दी। पर पिताजी नहीं माने और वे ट्रैक्टर चलाते रहे, क्योंकि घर की जरूरतें ऐसी थीं कि वे मजबूर थे।”
डॉक्टर की सलाह न मानने के कारण योगेश के पिताजी की स्थिति में सुधार नहीं हुआ। तब योगेश ने इसके लिए कोई रास्ता निकालने की सोची और जुट गए। योगेश ने ट्रैक्टर को बड़े ध्यान से देखना और समझना शुरू किया। दो दिन तक ट्रैक्टर को गहराई से समझने के बाद योगेश अपने काम पर जुट गए। उनका मकसद था पिताजी को ट्रैक्टर की सीट से हटाकर सुरक्षित करना और उसके लिए उन्हें ऐसा यन्त्र तैयार करना था जो बिना ड्राईवर के ट्रैक्टर को चला सके।
“मैंने दो दिन ट्रैक्टर को ध्यान से देखा और फिर रिमोट का मॉडल बनाने में जुट गया। 2004 मॉडल के ट्रैक्टर में तब पॉवर ब्रेक जैसे फंक्शन भी नहीं थे, फिर भी मैंने पिताजी से 2000 रूपये लिए और उनके लिए एक सेम्पल मॉडल बनाकर उन्हें दिखाया। पिताजी को पहले भरोसा नहीं था पर फिर मॉडल देखकर उन्हें पसन्द आया और उन्होंने रिमोट बनाने के लिए पैसा मंजूर कर दिया।”
पिताजी से 50 हज़ार रूपये लेकर योगेश ने अपना काम शुरू कर दिया। रिमोट मे लगने वाले बहुत से पार्ट उन्होंने घर पर ही बनाए।

इस वर्ष जून में ही उन्होंने पिताजी को सेम्पल मॉडल बनाकर दिखा दिया था; फिर अगले दो महीनों में उन्होंने पूरा रिमोट बनाकर ट्रैक्टर चला दिया।

 रिमोट बनाते वक़्त उन्होंने ध्यान रखा कि उसका मॉडल ठीक वैसा ही हो जैसा ट्रैक्टर में होता है।
“मेरे लिए चुनौती थी कि इस रिमोट को पिताजी चलाएंगे कैसे? इसलिए मैंने उसमें सबकुछ उसी तरह रखा जैसे ट्रैक्टर में होता है। रिमोट में ट्रैक्टर की तरह स्टेयरिंग है, क्लच, ब्रेक और गियर उसी तरह बनाने की कोशिश की है, ताकि किसान को चलाने में दिक्कत न आए।”
रिमोट में सेटेलाइट से ट्रैक्टर को कनेक्ट किया गया है। और डेढ़ किलोमीटर की रेंज तक ट्रैक्टर को इस रिमोट से चलाया जा सकता है। किसान खेत की मेंड़ पर बैठकर आराम से खेत की जुताई कर सकता है।
योगेश के गांव में बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर चलता देख लोग कौतूहल से भर गए। उन्होंने अपने इस मॉडल का वीडियो बनाकर यूट्यूब और व्हाट्सएप पर डाला तो वायरल हो गया। उसके बाद उनके पास कई किसान आए जिन्होंने इस तकनीक को अपने ट्रैक्टर में लगाने की मांग योगेश के सामने रखी।
रिमोट लगाने की कीमत के सवाल पर योगेश कहते हैं, “जैसे जैसे लोगों को पता चल रहा है, वो मेरे पास आ रहे हैं। अभी तक करीब 50 से 60 किसान मेरे पास आए हैं, जो अपने ट्रैक्टरों में ये तकनीक लगवाना चाहते हैं। मैं कोशिश कर रहा हूँ कि उन सब की मदद कर पाऊँ और इसे सस्ती से सस्ती कीमत में किसानों तक पहुंचाया जा सके”
वैसे योगेश का मानना है कि अगर इस पर थोडा और रिसर्च किया जाए तो इसकी कीमत 30 हज़ार रुपए तक आ सकती है। योगेश के पास आए किसानों ने इस रिमोट को लगाने के लिए एक लाख रूपये तक खर्च करने की बात कही है।
योगेश के पिता बाबूराम नागर खुश हैं और अपने बेटे पर गर्व करते हुए कहते हैं,”बेटे ने हमारे दर्द की वजह से इसका अविष्कार किया पर अब ये हमारे जैसे और भी किसान भाइयों के काम आएगा। इस बात की हमें ख़ुशी है और अपने बेटे पर गर्व है।”

योगेश का सपना है कि वे आर्मी के लिए एक अनोखा वाहन बनाएं।


योगेश अपनी 11 वीं कक्षा से आर्मी के लिए एक अनोखा वाहन डिजाइन कर रहे हैं, जो किसी भी मुसीबत में लड़ने के लिए तैयार हो। अब तक 30 से अधिक अविष्कार कर चुके योगेश एंटी-थेप्ट मशीन भी बना चुके हैं, जो आपके घर में किसी के घुसने की जानकारी आपको दुनियां के किसी भी कोने में दे सकती है। इसके साथ ही योगेश ने पॉवर सेवर नाम से एक उपकरण बनाया है जो सेटेलाइट से कनेक्ट होने की वजह से सभी बिजली उपकरणों को बन्द या चालू कर सकता है। इससे खेतों में लगे ट्यूबवेल भी घर बैठे चलाए जा सकते हैं, और खेत में बैठकर घर में जलती लाइट को भी बुझाया जा सकता है।
अपने अविष्कारों  के बारे ने बात करते हुए योगेश कहते हैं कि, “अब तक मैंने कुल 30 अविष्कार किए हैं; कुछ और अविष्कारों पर काम जारी है। मुझे जो भी समस्या अपने आसपास दिखती है, उसे मैं पहले गौर से समझता हूँ, फिर उसके समाधान के लिए 8 से 9 दिन रिसर्च करता हूँ और फिर कुछ ऐसा निकलता है जो अविष्कार बन जाता है। मुझे अविष्कारों में लगने वाले सामान के लिए पैसे की जरूरत रहती है जो नहीं मिल पाता। तो अगर सरकारी या निजी सहयोग मिले तो मैं अपने सपने को साकार कर पाउँगा और देश के लिए मेहनत से जुटकर कुछ योगदान दे पाउँगा।”
द बेटर इंडिया की ओर से योगेश के अविष्कार पर उन्हें बधाई और ऐसे युवाओं को सहयोग करने के लिए आप से निवेदन करते हैं कि जो सम्भव सहायता हो सके आप करें। आप अगर योगेश तक अपनी कोई भी सहायता पहुँचाना चाहते हैं, तो उनके इस नम्बर 8239898185 पर सम्पर्क कर सकते हैं।

शनिवार, 26 अगस्त 2017

हाजी मलंग यात्रा

इबादत के रंग : : हाजी मलंग
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मुम्बई के किनारे लगे कल्याण से एक घण्टे की दूरी पे अल्लाह ने जन्नत बसाई है.. कभी वक़्त हो तो भीगने और झूमने चले जाइए.. हम तो नाम सुने और खिंचे से चले गए.. एक फकीर ने कहा कि बाबा मलंग ने तुम्हें ऊपर तक चढ़ा ही लिया, उनका मन होगा तुमसे मिलने को...

भ्रमण उमंग : : हाजी मलंग
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शनिवार की शाम... साथियों के संग जब घूमने की बात ही चली तो ज़िक्र हाजी मलंग का हो उठा.. हाजी अली देखा था हाजी मांग का नाम सुना था.. सबकी हामी एकसाथ हुई और चल पड़े.. कल्याण पहुंचते-पहुंचते 6.30 बज गए, वहां से मलंगगढ़ के लिए बस नहीं मिली टेक्सी को एक्स्ट्रा पैसे देके निकल पड़े.. 
मलंगगढ़ से करीब तीन किलोमीटर की चढ़ाई है हाजी मलंग बाबा की दरगाह तक पहुंचने के लिए.. लगभग तीन हज़ार सीढियां चढ़नी होती हैं.. शुरू में चढ़े तो थकान के साथ भीगने से बचने की जद्दोजहद रही. लेकिन एकबार पूरे भीगे तो फिर न थकान हुई और न बचने की कोई कोशिश... आधे रास्ते में मजार पड़ती है वहां नमाज के बाद एक चाचा की दुकान पे पेटभर के खाया और हम ऊपर साढ़े दस बजे पहुँचे.. देरी से पहुंचने की अच्छी बात ये रही कि लौटने का विकल्प धूमिल होता गया.. और एक रात पहाड़ पे सोने को मिल गयी..
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जन्नत के रंग : : हाजी मलंग 
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ये अजूबे से कम नहीं है कि तीन किलोमीटर ऊंचे पहाड़ की चोटी पे पूरा गांव बसा है.. और आज से नहीं सदियों से लोग रह रहे हैं.. पानी के कुएं हैं और खाने की कमाई यात्रियों से निकलती है.. वहां इतना कुछ है कि अचम्भा होता ही कि इसे सीढ़ियों से कैसे ऊपर चढा के लाया गया होगा..
सुबह आँख खुली तो ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत सुबह ने झरनों से स्वागत किया.. सबसे पहले बाबा की दरगाह में जी भर के बैठे.. हम पहाड़ी के आंचल में बादलों की फुहारों के बीच थे.. ऊपर उमड़ रहे बादलों के नीचे हम घूम रहे थे.. पहाड़ी के किनारे पहुंचकर नीचे झाँके तो नज़ारे आँखो में समा नहीं पाए तो झट से मोबाइल में कैद करने लगे.. बूंदें झर रही थीं और हम हरी घास पर फिसलते कूदते जा रहे थे.. ऊँचाई से शहर डराता नहीं है खूबसूरत लगता है...
आने का मन नहीं कर रहा था, मगर लौटते हुए सीढ़ियों से रात को नज़ारे न देख पाने के मलाल ने लौटने में दिलचस्पी जगा दी.. और फिर लौटते हुए सीढियां हमें सरका रहीं थीं, रास्ते में एक रास्ते ने मोड़ दिया और हम झरने में मुंह धोने चले गए... साथियों की नौंकझौंक भजिया पाव जैसी रही..! तीन हज़ार सीढियां लौटते हुए और शानदार लग रही थीं.। जहाँ भी रास्ते ने नोंक छोड़ी वहां जब मन किया मुड़ लिए..
पिछली शाम को गए आज शाम लौटे...

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गुरुवार, 3 अगस्त 2017

शायरी के आसमान से फिल्मों की दुनियां में मोहब्बत का शायर



आज शकील बदायूँनी का जन्मदिवस है। चौदह वर्ष की उम्र में ही शेर कहने वाले शायर शकील अहमद बदायूं में 3 अगस्त 1916 को पैदा हुए। उसके बाद वे लखनऊ में पढे-लिखे और देश के नामी शायरों में शामिल हो गए। दिल्ली में नौकरी करते हुए उन्होंने देशभर में अपने कलामों से लोगों के दिलों पर राज किया और फिर मुम्बई आकर फिल्मो में अमर गीतों की रचना की।
उनके बहुचर्चित गीत ‘चौदहवीं का चाँद’ के संबंध में एक वाकया है, जिसमें उनके इस गीत में उर्दू शायरी के व्याकरण के अनुसार गलती उजागर होती है।
निदा फाज़ली अपने संस्मरण में कहते हैं, एक बार वे ग्वालियर में उनसे मिले थे| शकील साहब मुशायरों में गर्म सूट और टाई पहनकर शिरकत करते थे। ख़ूबसूरती से संवरे हुए बाल और चेहरे की आभा से वे शायर से अधिक फ़िल्मी कलाकार नज़र आते थे | मुशायरा शुरू होने से पहले वे पंडाल में अपने प्रशंसकों को अपने ऑटोग्राफ से नवाज़ रहे थे। उनके होंठों की मुस्कराहट कलम की लिखावट का साथ दे रही थी। इस मुशायरे में ‘दाग़’ के अंतिम दिनों के प्रतिष्ठित मुकामी शायरों में हज़रत नातिक गुलावटी को भी नागपुर से बुलाया गया था लंबे पूरे पठानी जिस्म और दाढ़ी रोशन चेहरे के साथ वो जैसे ही पंडाल के अंदर घुसे सारे लोग सम्मान में खड़े हो गए | शकील इन बुज़ुर्ग के स्वभाव से शायद परिचित थे, वे उन्हें देखकर उनका एक लोकप्रिय शेर पढते हुए उनसे हाथ मिलाने के लिए आगे बढे:
वो आँख तो दिल लेने तक बस दिल की साथी होती है,
फिर लेकर रखना क्या जाने दिल लेती है और खोती है.
लेकिन मौलाना नातिक इस प्रशंसा स्तुति से खुश नहीं हुए, उनके माथे पर उनको देखते ही बल पड़ गए | वे अपने हाथ की छड़ी को उठा-उठाकर किसी स्कूल के उस्ताद की तरह बोले,
“बरखुरदार, मियां शकील! तुम्हारे तो पिता भी शायर थे और चचा मौलाना जिया-उल-कादरी भी उस्ताद शायर थे तुमसे तो छोटी-मोटी गलतियों की उम्मीद हमें नहीं थी पहले भी तुम्हें सुना-पढ़ा था मगर कुछ दिन पहले ऐसा महसूस हुआ कि तुम भी उन्हीं तरक्कीपसंदों में शामिल हो गए हो, जो रवायत और तहजीब के दुश्मन हैं | ”
मौलाना नातिक साहब भारी आवाज़ में बोल रहे थे। शकील इस तरह की आलोचना से घबरा गए पर वे बुजुर्गो का सम्मान करना जानते थे। वे सबके सामने अपनी आलोचना को मुस्कराहट से छिपाते हुए उनसे पूछने लगे,
“हज़रत आपकी शिकायत वाजिब है लेकिन मेहरबानी करके गलती की निशानदेही भी कर दें तो मुझे उसे सुधारने में सुविधा होगी”
उन्होंने कहा,
“बरखुरदार, आजकल तुम्हारा एक फ़िल्मी गीत रेडियो पर अक्सर सुनाई दे जाता है, उसे भी कभी-कभार मजबूरी में हमें सुनना पड़ता है और उसका पहला शेर यों है:

चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो,
जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो |

”मियां इन दोनों मिसरों का वज़न अलग-अलग है पहले मिसरे में तुम लगाकर यह दोष दूर किया जा सकता था | कोई और ऐसी गलती करता तो हम नहीं टोकते, मगर तुम हमारे दोस्त के लड़के हो, हमें अजीज़ भी हो इसलिए सूचित कर रहे हैं | बदायूं छोड़कर मुंबई में भले ही बस जाओ मगर बदायूं की विरासत का तो पालन करो |’
शकील अपनी सफाई में संगीत, शब्दों और उनकी पेचीदगिया बता रहे थे उनकी दलीलें काफी सूचनापूर्ण और उचित थीं, लेकिन मौलाना ‘नातिक’ ने इन सबके जवाब में सिर्फ इतना ही कहा- “मियां हमने जो “मुनीर शिकोहाबादी” और बाद में मिर्ज़ा दाग से जो सीखा है उसके मुताबिक़ तो यह गलती है और माफ करने लायक नहीं है | हम तो तुमसे यही कहेंगे, ऐसे पैसे से क्या फायदा जो रात-दिन फन की कुर्बानी मांगे |’
उस मुशायरे में नातिक साहब को शकील के बाद अपना कलाम पढ़ने की दावत दी गई थी उनके कलाम शुरू करने से पहले शकील ने खुद माइक पर आकर कहा था- ‘हज़रत नातिक इतिहास के जिंदा किरदार हैं | उनका कलाम पिछले कई नस्लों से ज़बान और बयान का जादू जगा रहा है, कला की बारीकियों को समझने का तरीका सीखा रहा है और मुझ जैसे साहित्य के नवागंतुकों का मार्गदर्शन कर रहा है | मेरी गुज़ारिश है आप उन्हें सम्मान से सुनें | ‘
शकील साहब के स्वभाव में उनके धार्मिक मूल्य थे | अपनी एक नज़्म ‘फिसीह उल मुल्क’ में दाग के हुज़ूर में उन्होंने “साइल देहलवी”, “बेखुद”, “सीमाब” और “नूह नार्वी” आदि का उल्लेख करते हुए दाग की कब्र से वादा भी किया था:
ये दाग, दाग की खातिर मिटा के छोड़ेंगे,
नए अदब को फ़साना बना के छोड़ेंगे |
शकील साहब का व्यक्तित्व बेहद चमकदार था, वे मुशायरों में किसी हीरो से कम नहीं लगते थे और कहा जाता है कि अपने साथ अपने शागिर्दों और प्रसंशकों भी मुशायरों में ले जाते रहे।

उन्होंने अपना पहला गीत फिल्मों में इतना शानदार लिखा कि नौशाद साहब उनके हमेशा के लिए मुरीद हो गए। वो गीत था:-
हम दिल का अफ़साना दुनियां को सुना देंगे हर दिल में मुहब्बत की आग लगा देंगे
शकील साहब के गीतों में ‘प्यार किया तो डरना क्या’ से लेकर ‘नन्हा मुन्हा राही हूँ’ तक एक लम्बी और दिल अज़ीज फेहरिश्त है, जिसे दुनियां सदियों तक याद रखेगी।‎

सोमवार, 31 जुलाई 2017

खूब पढ़े होंगे उपन्यास और कहानियां, जन्मदिन पर पढ़िए कथासम्राट प्रेमचन्द के पत्र और कविताएँ

प्रेमचन्द उन साहित्यकारों में रहे हैं जिनकी लेखनी और जीवन में कोई अंतर नहीं रहा। उन्होंने गांधी जी के कहने पर नौकरी छोड़ दी थी। वे कहते रहे कि मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। मैं साहित्य और स्वराज के लिए कुछ करते रहना चाहता हूँ।
प्रेमचन्द जी के जन्मदिवस पर दो पत्र यहां पढ़ सकते हैं जो उन्होंने बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखे थे, उनमें उनका व्यक्तित्व साफ़ झलकता है।

पहला पत्र उन्होंने 3 जुलाई 1930 में लिखा:-

“मेरी आकांक्षाएं कुछ नहीं है। इस समय तो सबसे बड़ी आकांक्षा यही है कि हम स्वराज्य संग्राम में विजयी हों। धन या यश की लालसा मुझे नहीं रही। खानेभर को मिल ही जाता है। मोटर और बंगले की मुझे अभिलाषा नहीं। हाँ, यह जरूर चाहता हूँ कि दो चार उच्चकोटि की पुस्तकें लिखूं, पर उनका उद्देश्य भी स्वराज्य-विजय ही है। मुझे अपने दोनों लड़कों के विषय में कोई बड़ी लालसा नहीं है। यही चाहता हूं कि वह ईमानदार, सच्चे और पक्के इरादे के हों। विलासी, धनी, खुशामदी सन्तान से मुझे घृणा है। मैं शान्ति से बैठना भी नहीं चाहता। साहित्य और स्वदेश के लिए कुछ-न-कुछ करते रहना चाहता हूँ। हाँ, रोटी-दाल और तोला भर घी और मामूली कपड़े सुलभ होते रहें।”

दूसरा पत्र उन्होंने 1 दिसम्बर 1935 में लिखा:-

“जो व्यक्ति धन-सम्पदा में विभोर और मगन हो, उसके महान् पुरुष होने की मै कल्पना भी नहीं कर सकता। जैसे ही मैं किसी आदमी को धनी पाता हूँ, वैसे ही मुझपर उसकी कला और बुद्धिमत्ता की बातों का प्रभाव काफूर हो जाता है। मुझे जान पड़ता है कि इस शख्स ने मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को – उस सामाजिक व्यवस्था को, जो अमीरों द्वारा गरीबों के दोहन पर अवलम्बित है-स्वीकार कर लिया है। इस प्रकार किसी भी बड़े आदमी का नाम, जो लक्ष्मी का कृपापात्र भी हो, मुझे आकर्षित नहीं करता। बहुत मुमकिन है कि मेरे मन के इन भावों का कारण जीवन में मेरी निजी असफलता ही हो। बैंक में अपने नाम में मोटी रकम जमा देखकर शायद मैं भी वैसा ही होता, जैसे दूसरे हैं -मैं भी प्रलोभन का सामना न कर सकता, लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि स्वभाव और किस्मत ने मेरी मदद की है और मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। इससे मुझे आध्यात्मिक सान्त्वना मिलती है।”

मुंशी प्रेम चंद की कविताएं

प्रेमचंद कवितायेँ नहीं लिखते थे, लेकिन उन्होंने अपनी कहानियों में कई बार कविताएँ शामिल की हैं।
यहाँ कुछ उन कविताओं या काव्यांशों को प्रकाशित कर रहे हैं, जिन्हे कथा सम्राट प्रेम चंद की कहानियों में जगह मिली है। यह किसकी रचनाएं हैं यह जानने से कहीं महत्वपूर्ण है कि ये प्रेम चंद की पसंदीदा कविताएं हैं, पसंदीदा मैं इसीलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि ये कविताएं आज यहाँ जीवन पा रही हैं, कविताएं ऐसे भी जिंदा रहती हैं । यह सिलसिला चलता रहेगा, आज पढ़िये प्रेम चंद की पसंद में दो कविताएं।
पहली कविता
क्या तुम समझते हो ?
क्या तुम समझते हो मुझे छोड़कर भाग जाओगे ?
भाग सकोगे ?
मैं तुम्हारे गले में हाथ डाल दूँगी,
मैं तुम्हारी कमर में कर-पाश कस लूँगी,
मैं तुम्हारा पाँव पकड़ कर रोक लूँगी,
तब उस पर सिर रख दूँगी,
क्या तुम समझते हो,
मुझे छोड़ कर भाग जाओगे ?
छोड़ सकोगे ?
मैं तुम्हारे अधरों पर अपने कपोल
चिपका दूँगी,
उस प्याले में जो मादक सुधा है-
उसे पीकर तुम मस्त हो जाओगे।
और मेरे पैरों पर सिर रख दोगे।
क्या तुम समझते हो मुझे छोड़ कर भाग जाओगे ?
( यह कविता रसिक संपादक कहानी से है और वहाँ इसकी रचनाकार कामाक्षी हैं )
दूसरी कविता
माया है संसार
माया है संसार सँवलिया, माया है संसार
धर्माधर्म सभी कुछ मिथ्या, यही ज्ञान व्यवहार,
सँवलिया माया है संसार।
गाँजे, भंग को वर्जित करते, है उन पर धिक्कार,
सँवलिया माया है संसार।
( यह पद गुरु मंत्र कहानी से)