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मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

आखिरी हर्फों में

कोर्स ख़त्म होने की कगार पर है. अलगाव के वक़्त में जुड़ाव ज्यादा होने लगता है. फिर लगने लगता है की कुछ कम हो जायेगा जीवन से. अलगाव अच्छा नही लगता ऐसा नहीं है लेकिन एक अजीब सी तीस उठती है की काश ये ना ही होता तो कितना अच्छा होता.
पत्रकारिता से विज्ञापन एवं जनसंचार का सफ़र कैसा रहा इसे व्यक्त करना मुश्किल है लेकिन इतन है की जो रास्ता यहाँ से मिला है उस पर यहाँ की सीखों को साथ लेकर चला गया तो जीवन आनंद से भर जायेगा.
अभी तक जो मुझे इस क्षेत्र के जिन पहलुओं से लगाव हुआ है वे हैं- विज्ञापन हमें सिखाता है अपनी बात को रोचक तरीके से कहने का कौशल और जनसंपर्क हमें संकट में संवाद की शैली के साथ-साथ कम्युनिकेशन से हम समाधान से लेकर प्रेरणा कैसे दे सकते हैं.
दोनों विषय जब जीवन के धरातल पर उतरते हैं तो लगता है की ये दोनों विषय हर जीव को सिखाने चाहिए. कम शब्दों में, कम समय में अपनी बात इस तरह रखना की भारी-भरकम बात भी आसन और रोचक लगे, और उसे करने के लिए प्रेरणा मिले, मतलब बात सुनकर फिर कदम मजिल पर ही रुकें, यही विज्ञापन की कला है.
विज्ञापन हमारा वो दोस्त है जो हमें मजे मजे में जीना सिखाता है. बोरियत नाम की चीज उसके जिस्म में नहीं है. नकारात्मक, निराशा, समस्या जैसे शब्द उसकी डिक्शनरी में नहीं है. हमेशा किसी विषय या समस्या को लेकर समाधान लिए खड़ा रहता है. हर अँधेरे की रौशनी है इसके पास. हमेशा आपको बेहतरी के सपने दिखता है.
आरामपसंद आलोचक इसे लालच भी कहते हैं लेकिन मियां जीवन में सपने नहीं होंगे तो हम कैसे आगे बढ़ेंगे. ज़िन्दगी रुक जाने का नाम नहीं है. जहाँ रुके वहीं ख़त्म हो जाती है.

जनसंपर्क हमें असली संवाद की कला सिखाता है. रिश्ते बनाने के लिए हमें कैसे संवाद करना है उन्हें बनाये रखने के लिए कैसे संवाद की डोर जुडी रहनी चाहिए और मुश्किल के वक्त कैसे संवाद रिश्ते को जोड़े रहता है इसे जनसंपर्क से बेहतर कोई नहीं सिखा सकता.. संवाद से मानव जीवन में कितने रस भरे जा सकते है, ये जनसंपर्क की कलाओं से सीखिए. हमारे रोजमर्रा की आदतों में संवाद का स्वरुप थोडा सा बेहतर कर लिया जाये तो ज़िन्दगी में रौनक आ जाती है. ज़िन्दगी जिंदा सी होने लगती है.
कुछ लोग इसे चापलूसी या चटुकारिता कहते हैं, वे वो लोग हैं जो कभी इसकी परिभाषा भी नहीं पढ़े हैं. जनसंपर्क में पहली शर्त ही ईमानदारी है, फिर संवाद की निरंतरता.. अगर दुसरे को ज्यादा महत्त्व देने को आप चापलूसी कहते हैं तो फिर ऐसा कोई इंसान बताइए जो किसी को सम्मान न देता हो और लोग उससे जुड़े हों..
संवाद में जुड़ाव हमेशा ईगो को तोडकर ही आता है. अभिमान रिश्ते की सबसे बड़ी रूकावट है, जनसंपर्क इसे खत्म कर देता है. और  भी सावधानियां हैं जिन्हें हमें मानव होने के नाते ध्यान में रखना चाहिए लेकिन हम अपनी धुन में नहीं रखते..

इस क्षेत्र को मैं दिल से मोहब्बत करता हूँ और इसका अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करूँगा. 

मंगलवार, 8 मार्च 2016

गूंजती आवाजें

आयोजन उस ऊँचाई पर था जहाँ से देश का सबसे ऊंचा झंडा बैकग्राउंड में लहराता साफ़ दिख रहा था. और उस झंडे के आगे दुनिया बदलती भारतीय महिलाओं की हकीकत कहानियाँ बन कर गूँज रही थीं...
कहानी चांदनी की जिसकी खबर किसी ने नहीं ली तो उसने ऐसी ठानी कि तब तक लडती रही जब तक दुनियाँ के अनोखे अखबार 'बालक नामा' अखबार की संपादक नहीं बन गयी और आज सपने पाल रही है अपने जैसों के सपने हकीकत में बदलने के लिए...

रिया शर्मा कहाँ तो अमेरिका में अपने फैशन के पैशन को उड़ान दे रही थी लेकिन कैसे भारत में ऐसिड पीड़ितों की मुहब्बत में जीवन लगाने का फैसला कर लिया और स्थापित किया‪#‎MakeLoveNotScare‬.
कहानी इलाहाबाद की रेशमा की जिसके जीजा ने तेजाब से चेहरा इतना बर्बर बना दिया कि आईने में देखने से बेहतर आत्महत्या का विकल्प लगने लगा. लेकिन आज कैसे देश में ऐसिड बैन के खिलाफ जंग छेड़े है. हाँ वही रेशमा जो आजकल चर्चित वीडियोज में ब्यूटी टिप्स बताती है और अंत में ऐसिड टिप से हैरत में डाल देती है...

रंगों की सौदागर नीति जैन के सपनों को कैनवास पर जब पिता ने रंग नहीं भरने दिए तो उसने अपने पैरों पर खड़े होकर अपने जैसे दूसरों के सपनों को रंगने के लिए बना लिया 'रंगरेज'..
और आखिरी कहानी कभी कैंसर से जूझती भोपाल की कनिका की जिसे हाल ही में फ़ोर्ब्स ने एशिया के उभरते तीस उद्यमियों की श्रेणी में नामित किया है....
तिरंगा हर हकीकत का गवाह बनकर ‪#‎जोश‬ में लहराता रहा. गर्व था तीनों रंगों को दुनियाँ रचती इन बेबाक जुनूनी रचनाओं पर.... महिला दिवस की शुभकामनाएँ.! 
 


शनिवार, 5 मार्च 2016

फुटपाथ के बच्चे निकालते हैं दुनिया का अनोखा अखबार 'बालकनामा'

'जब तुम्हें कोई रास्ता न दे तो अपनी राह खुद ही बना लेनी चाहिए. फिर वो आपकी बनाई राह आने वाली पीढ़ी को रास्ता दे देगी.' 
सोचने में थोडा मुश्किल जरुर है लेकिन असंभव नहीं है. और इसे साबित किया है दिल्ली के सडक पर रहने वाले कामकाजी बच्चों ने. जब इनकी खबर किसी ने नहीं ली तो इन्होने खुद ही खबरें छापने की मुहिम को जन्म दे दिया. और इस तरह शुरू हुआ दुनिया का अनोखा अखबार 'बालकनामा'. गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज 'बालकनामा' दुनियाँ का ऐसा अनोखा अखबार है जिसे सडक पर रहने वाले कामकाजी बच्चे निकालते हैं. ये बच्चे खुद ही इसके रिपोर्टर हैं. खबरें खुद ही लिखते हैं और जिसे लिखना नहीं आता वो बोल-बोल कर लिखने वाले से लिखवा लेता है. फिर इसे खुद ही एडिट कर छापते हैं और दस हज़ार बच्चों तक पहुंचाते हैं.

फुटपाथ की ज़िंदगी कभी सुर्खियाँ नहीं बन पाती, चाहे बात देश के भविष्य की ही क्यों न हो? देश की राजधानी में भी इनकी समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता. 'चेतना' नाम की गैर सरकारी संगठन ने इन बच्चों को ये प्लेटफोर्म दिया जहाँ अपनी बात न सिर्फ रख सकते हैं बल्कि हजारों लोगों तक पहुँचा सकते हैं.
बालकनामा की पांच हज़ार प्रतियाँ छपती हैं. ये पहले त्रिमासिक था लेकिन अब हर दो महीने पर छपता है और सम्पादकीय टीम इसे हर महीने छापने कि योजना पर काम कर रही है.
इस अखबार में इनकी अपनी दुनियाँ की ख़बरें होती हैं जो मुख्य धारा के मीडिया में कभी नहीं आतीं. फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों की समस्याएं और उन पर होते अत्याचार की खबरें सीधे उन्हीं बच्चों से लिखवाई जाती हैं. बाल मजदूरी, यौन अपराध और पुलिस के अत्याचार की ख़बरें छपती हैं.


कहते हैं ना कि प्रतिभाए आभाव में ही निखरती हैं. इनकी अपनी निजी ज़िंदगी की कहानियाँ भी कम प्रेरित करने वाली नहीं हैं. अपने बचपन में जितनी मुसीबतों से इनका सामना हुआ उन्हीं मुसीबतों से अब औरों को बचा रहे हैं.
इनके एक रिपोर्टर हैं शम्भू. शम्भू अपने बारे में बताते हुए कहते हैं कि "मैं पहले गाँव में अपने परिवार के साथ रहता था, गरीबी के कारण पापा मुझे काम करवाने के लिए दिल्ली ले आये जहाँ उन्होंने मुझे एक दुकान पर लगा दिया. दुकान का मालिक मुझे मारता था इसीलिए फिर वहाँ से छोड़कर स्टेशन पर ठेला लगाने लगा. मुझे पढ़ने का बेहद शौक था. सामान बेचते-बेचते जब किसी को स्कूल की ड्रेस में देखता था तो मैं भी अपने पापा से कहता था कि मुझे भी पढ़ने जाना है"

बालकनामा की संपादक शन्नो इस अखबार से २००८ से जुड़ी. वे बताती हैं कि बलाकनामा के चार शहरों में रिपोर्टर जुड़े हैं. जिनसे हम समय समय पर मिलते रहते हैं.
"बालकनामा के रिपोर्टर दिल्ली, आगरा, झाँसी और ग्वालियर शहरों के कामकाजी बच्चे हैं, जिनसे हम ख़बरें लेते हैं. हमारे दो तरह के रिपोर्टर हैं. एक तो वे, जो लिख सकते हैं जो हमारे प्रॉपर रिपोर्टर हैं. और दूसरे जिन्हें हम बातूनी रिपोर्टर बोलते हैं, वे अपनी ख़बरें बोल-बोल के हमसे लिखवाते हैं."

विजय कुमार बालक नामा के सलाहकार हैं. विजय कुमार देश-विदेश के कई सार्वजनिक मंचों पर अपनी प्रेरक कहानी सुना चुके हैं. वे अखबार के पाठकों के बारे में बताते हैं "हमारा जो संगठन है 'बढते कदम' उससे दस हज़ार बच्चे जुड़े हैं जिन तक ये अखबार पहुँचता है. इसके अलावा हम बाज़ारों में आम लोगों को और बच्चों के लिए काम करने वाले संगठनों को भी भेजते हैं."

सम्पादकीय टीम में शामिल चांदनी २०१० से बालक-नामा से जुड़ीं और २०१२ से २०१५ तक संपादक भी रही हैं. चांदनी कहती हैं कि "ये बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं और अगर सरकार विकास की शुरुआत इन बच्चों से करेगी तो देश सबसे बेहतर विकास करेगा" चांदनी का सपना है कि वो बचपन को संवारेंगी और उन्हें वो सबकुछ देने की कोशिश करेंगीं जो उसे नहीं मिल पाया. "मेरा स्कूल जाने का बहुत मन करता था पर मेरी मां मुझे हर बार स्कूल से पकड़ के ले आती थी वो कहती थी कि अगर तू स्कूल जायेगी तो कमाएगा कौन? अभी मैं यहाँ जुड़ने के बाद ओपन स्कूल से पढाई कर रही हूँ. जो शिक्षा मैं नहीं पा सकी वो मैं अपने जैसे बच्चों को दूंगीं. ये मेरा सपना है कि जो बच्चे कहीं फंसे हुए हैं उन्हें बेहतर ज़िंदगी मिल सके."

बालक नामा प्रेरणा का स्रोत है हम सबके लिए जो संसाधनों के इतने बड़े संसार में काम करते हैं. जहाँ अभाव है वहाँ संभावनाएं भी पैदा की जा सकती हैं. जहाँ रास्त नाहीं है वहाँ नई सडक बनाने का बेहतरीन अवसर हमेशा मौजूद रहता है. दुनियाँ के सारे रास्ते ऐसे ही बने हैं.

हरा हरा के खुद तो नहीं हार जाओगी ज़िंदगी

कुछ दिनों से तुम बहुत शांत हो गयी हो. ज़िंदगी तुम्हरी चुप्पियाँ मुझे अच्छी नहीं लगतीं. मुझे हरा के तुम खुद तो नहीं हार गयी हो ज़िंदगी. तुमने भी इतने बार हराया है कि तुम्हें भी कहीं ये तो नहीं लग रहा कि अब और कितना? एहसास तो जरुर होता ही होगा कि जीत के इतने करीब ले जाकर हराया है तुमने. और एक बार नहीं कई कई बार जीत हाथों में देकर फिसलन पैदा की हैं तुमने. अब तो तुम्हें भी लगने लगा होगा कि हो क्या रहा है.


मेरी हार का तुम रंज न करो. तुम्हें पता है असल हार तब होती है जब मैं खुद मान लूं कि मै हार गया. जीत और हार खुद से तय होती है किसी और के बताने से नहीं. अभी तो मैंने अपने परिणामों में जीत ही हासिल की है. मेरे लिए ये हर हार एक जीत है. हर सफर में मैं कुछ कदम आगे बढ़ ही रहा हूँ और ठोकर खा रहा हूँ.

ठोकरों की एक गजब की बात है कि हमेशा तुम्हें आगे ही फेंकती हैं. और इसीलिए मैं थोडा थोडा ही सही आगे बढ़ता ही जा रहा हूँ. इसके साथ ही मैं बार बार गिरने की वजह से संभालना भी सीखता जा रहा हूँ.

सफलता दिल में होती है. खुद का सर्वश्रेष्ट करने की सफलता और उससे संतुष्ट हो जाने की सफलता. 

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

विजेता_के_लिए‬,

जब ख्वाब को कोई चोट लगे 
जब आँखे झुककर छिपना चाहें
जब साँसों मे कोई आह लगे 
जब रुककर हम कुछ रोना चाहें

जब लगे कि कदम नही बढते हैं 
तन बस गिरकर सोना चाहे..
तब मेरे ओ प्यारे साथी..!

तुम झुकना मत, बस रुकना मत
तुम मेरा हाथ थाम लेना
तुम गिरना मत, बस हारना मत
तुम मुझे सिखाना और मैं तुम्हें संवारुंगा
तुम होगे संग तो कोई राह निकालूँगा....

वक़्त भी एकदिन बदलेगा
फिर अपना कर्म भी रंग लेगा
हम चलते रहेंगे धुन अपनी
कल अपना हुनर भी चमकेगा..!
इतना कुछ है इस दुनियाँ मे
कि वक़्त नहीं है एक पल खाली
क्यों हम बैठें किसी शोक में
चल उठ दे हाथ बजाएं ताली

इस दुनियाँ के कैनवास पर
कितने रंग हैं देखेंगे
फिर खुद को रचकर दुनिया को
कुछ ऐसे ढंग से रच देंगे
कहीं रंगोली-कहीं मटमैली सी
एक इबारत लिख देंगे
जितना रब ने भेजा है
उसका सबकुछ सबको दे दें
सांसे चल रही हैं अभी साथ-साथ
तो आओ जिंदा होने का सबूत दे दें..!


विजेता_के_लिए‬, जो जीत के लिए जन्मा है.

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

नववर्ष कुछ यूं आए

जीवन में सच्चाई लेकर
खुशियों की अंगडाई लेकर
बागों की अमराई लेकर
बार-बार शहनाई लेकर
ये साल आपके जीवन में आए लाख बधाई लेकर..
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मंजिलों पर अब हक हो अपना
खुद ही लिख लें अपना सपना
जीना अब अपने ख्वावों को
दिल में इश्क-खुदाई लेकर...
ये साल आपके जीवन में आये लाख बधाई लेकर....
****************************************
कोशिश अब परिणाम में बदलें
जो कदम बढे अंजाम में बदलें
कोई साथ ना दे तो रुक ना जाएँ
चलें संग परछाई लेकर.....
ये साल आपके जीवन में आये लाख बधाई लेकर....
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हर क्षण को इतिहास बना दें
मुश्किल को उपहास बना दें
चुनौतियों से ऐसे खेलें
कि चिंता जाए विदाई लेकर....
ये साल आपके जीवन में आये लाख बधाई लेकर....
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भरकस जीना हर एक पल को
भूल जाएँ हम मौत के डर को
जीवन को जीना सिखला दें
अमिट नयी ऊँचाई देकर....
ये साल आपके जीवन में आये लाख बधाई लेकर....
**********************************************
नए वर्ष में आपके अद्भुत जीवन की कामना करते हुए समर्पित मेरे शब्द..
नववर्ष की ढेरों शुभकामनाएं सहित..!

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

चल पड़े हों ये कदम..

चल पड़े हों जिस तरफ भी,
ये कदम फिर ना डिगें.

फासला कितना भी हो,
मंजिल से पहले ना रुकें..
हौसला दिल में हो इतना,
मुश्किलों से ना डरें..
ठोकरें खाकर उठें फिर,
मन में निराशा ना भरें...
मंजिलें तकती हैं राहें,
चल चला साथिया...!

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

तेरे हिस्से का वक़्त...


"जिसने वक़्त को नही समझा वो हमेशा हारा है " ये पंक्ति किसी महानुभाव ने किसी ज़माने में लिखी होगी , मगर इसका सिक्का ऐसा जमा कि हर कोई भयभीत रहने लगा। और सबने वक़्त को कैद करना चाहा।  लेकिन जब बुद्धिमानों की समझ में ये आया कि "वक़्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता।" तो फिर हार मानने की  बजाय वक़्त को बाँट दिया।  पहले सालों में , महीनों में , हफ़्तों में ,दिनों में ,घंटों में ,मिनटों में  फिर सेकण्डों में और अब तो सेकण्ड के भी हजारों हिस्से कर दिए गये हैं। मगर फिर भी वक़्त है कि  हाथ ही नहीं आता.

यूँ तो ये वक़्त दिनभर सरपट दौड़ता रहता है, सांस लेने तक की फुर्सत नहीं मिलती। मगर जैसे ही शाम होती है , तो सूरज के साथ वक़्त भी ढलने लगता है और रात होते होते ठहर सा जाता है। लगता है जैसे इसके साथ ही मेरी साँसे भी ठहर जाएंगी। मैं हर शाम से देर रात तक तुम्हारा इंतज़ार करता हूँ , जब तक कि तुम सो नहीं जाते (मुझे पता है, तुम कब सोते हो ). मगर तुम नहीं आते लेकिन हाँ तुम्हारे हिस्से का वक़्त जरूर चला आता है,,,,एक घने कोहरे की  चादर ओढ़े।  और फिर वही दिनभर सरपट दौड़ने वाला वक़्त इत्मिनान से सुस्ताता  है , लगता है जैसे घड़ी की सुइयाँ बर्फ़ सी जम गईं हैं और उन्हें अलाव की  जरूरत है। 
 आजकल दिन छोटे और रातें बहुत लम्बी होने लगीं हैं। 


तू मेरी ज़िंदगी में शामिल नहीं है लेकिन …
तेरे हिस्से का वक़्त आज भी तन्हा गुजरता है।

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

वक़्त कब कहाँ रुका है किसी के लिए...

.

कमबख्त एक पल भी नहीं ठहरता कि,

रुक जाएँ कुछ साँसे

थम जाये नब्ज कुछ लम्हे  लिए

न बहे लहू इन धमनियों में कुछ पल

ठहर जाये आँखों के ख्वाबों का कारवां,   कुछ अरसे के लिए

ख़त्म  जाएँ सवालों के नुकीले नश्तर,    कुछ  लिए

जम जायें अतीत के पन्नों के चलचित्र,  कुछ लम्हों के लिए

  मैं न रहूँ,.... रहकर भी… कुछ वक़्त के लिए 

बुधवार, 12 जून 2013

आखिर मुरझा गया,
                              वो कोमल पौधा..
जिसे सूरज ने अपनी तपिश से महरूम रखा..
हवा के  तेज रुख ने ,
                            उसकी अनिर्मित जड़ें झकझोर दीं.
और जलाशय के किनारे खड़ा-खड़ा सुख गया..

 
                     
 आज उसने दम तोड़ दिया..

मगर,      सूखने से पहले,   मुरझाते-मुरझाते
            घुटता रहा वो....   जीने की कश्मकश में
           लड़ता रहा.....   अर्जित करने को - हवा, धूप और पानी.
           उसकी आख़िरी सांस में उम्मीद बह गयी......