शनिवार, 26 अगस्त 2017

हाजी मलंग यात्रा

इबादत के रंग : : हाजी मलंग
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मुम्बई के किनारे लगे कल्याण से एक घण्टे की दूरी पे अल्लाह ने जन्नत बसाई है.. कभी वक़्त हो तो भीगने और झूमने चले जाइए.. हम तो नाम सुने और खिंचे से चले गए.. एक फकीर ने कहा कि बाबा मलंग ने तुम्हें ऊपर तक चढ़ा ही लिया, उनका मन होगा तुमसे मिलने को...

भ्रमण उमंग : : हाजी मलंग
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शनिवार की शाम... साथियों के संग जब घूमने की बात ही चली तो ज़िक्र हाजी मलंग का हो उठा.. हाजी अली देखा था हाजी मांग का नाम सुना था.. सबकी हामी एकसाथ हुई और चल पड़े.. कल्याण पहुंचते-पहुंचते 6.30 बज गए, वहां से मलंगगढ़ के लिए बस नहीं मिली टेक्सी को एक्स्ट्रा पैसे देके निकल पड़े.. 
मलंगगढ़ से करीब तीन किलोमीटर की चढ़ाई है हाजी मलंग बाबा की दरगाह तक पहुंचने के लिए.. लगभग तीन हज़ार सीढियां चढ़नी होती हैं.. शुरू में चढ़े तो थकान के साथ भीगने से बचने की जद्दोजहद रही. लेकिन एकबार पूरे भीगे तो फिर न थकान हुई और न बचने की कोई कोशिश... आधे रास्ते में मजार पड़ती है वहां नमाज के बाद एक चाचा की दुकान पे पेटभर के खाया और हम ऊपर साढ़े दस बजे पहुँचे.. देरी से पहुंचने की अच्छी बात ये रही कि लौटने का विकल्प धूमिल होता गया.. और एक रात पहाड़ पे सोने को मिल गयी..
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जन्नत के रंग : : हाजी मलंग 
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ये अजूबे से कम नहीं है कि तीन किलोमीटर ऊंचे पहाड़ की चोटी पे पूरा गांव बसा है.. और आज से नहीं सदियों से लोग रह रहे हैं.. पानी के कुएं हैं और खाने की कमाई यात्रियों से निकलती है.. वहां इतना कुछ है कि अचम्भा होता ही कि इसे सीढ़ियों से कैसे ऊपर चढा के लाया गया होगा..
सुबह आँख खुली तो ज़िन्दगी की सबसे खूबसूरत सुबह ने झरनों से स्वागत किया.. सबसे पहले बाबा की दरगाह में जी भर के बैठे.. हम पहाड़ी के आंचल में बादलों की फुहारों के बीच थे.. ऊपर उमड़ रहे बादलों के नीचे हम घूम रहे थे.. पहाड़ी के किनारे पहुंचकर नीचे झाँके तो नज़ारे आँखो में समा नहीं पाए तो झट से मोबाइल में कैद करने लगे.. बूंदें झर रही थीं और हम हरी घास पर फिसलते कूदते जा रहे थे.. ऊँचाई से शहर डराता नहीं है खूबसूरत लगता है...
आने का मन नहीं कर रहा था, मगर लौटते हुए सीढ़ियों से रात को नज़ारे न देख पाने के मलाल ने लौटने में दिलचस्पी जगा दी.. और फिर लौटते हुए सीढियां हमें सरका रहीं थीं, रास्ते में एक रास्ते ने मोड़ दिया और हम झरने में मुंह धोने चले गए... साथियों की नौंकझौंक भजिया पाव जैसी रही..! तीन हज़ार सीढियां लौटते हुए और शानदार लग रही थीं.। जहाँ भी रास्ते ने नोंक छोड़ी वहां जब मन किया मुड़ लिए..
पिछली शाम को गए आज शाम लौटे...

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गुरुवार, 3 अगस्त 2017

शायरी के आसमान से फिल्मों की दुनियां में मोहब्बत का शायर



आज शकील बदायूँनी का जन्मदिवस है। चौदह वर्ष की उम्र में ही शेर कहने वाले शायर शकील अहमद बदायूं में 3 अगस्त 1916 को पैदा हुए। उसके बाद वे लखनऊ में पढे-लिखे और देश के नामी शायरों में शामिल हो गए। दिल्ली में नौकरी करते हुए उन्होंने देशभर में अपने कलामों से लोगों के दिलों पर राज किया और फिर मुम्बई आकर फिल्मो में अमर गीतों की रचना की।
उनके बहुचर्चित गीत ‘चौदहवीं का चाँद’ के संबंध में एक वाकया है, जिसमें उनके इस गीत में उर्दू शायरी के व्याकरण के अनुसार गलती उजागर होती है।
निदा फाज़ली अपने संस्मरण में कहते हैं, एक बार वे ग्वालियर में उनसे मिले थे| शकील साहब मुशायरों में गर्म सूट और टाई पहनकर शिरकत करते थे। ख़ूबसूरती से संवरे हुए बाल और चेहरे की आभा से वे शायर से अधिक फ़िल्मी कलाकार नज़र आते थे | मुशायरा शुरू होने से पहले वे पंडाल में अपने प्रशंसकों को अपने ऑटोग्राफ से नवाज़ रहे थे। उनके होंठों की मुस्कराहट कलम की लिखावट का साथ दे रही थी। इस मुशायरे में ‘दाग़’ के अंतिम दिनों के प्रतिष्ठित मुकामी शायरों में हज़रत नातिक गुलावटी को भी नागपुर से बुलाया गया था लंबे पूरे पठानी जिस्म और दाढ़ी रोशन चेहरे के साथ वो जैसे ही पंडाल के अंदर घुसे सारे लोग सम्मान में खड़े हो गए | शकील इन बुज़ुर्ग के स्वभाव से शायद परिचित थे, वे उन्हें देखकर उनका एक लोकप्रिय शेर पढते हुए उनसे हाथ मिलाने के लिए आगे बढे:
वो आँख तो दिल लेने तक बस दिल की साथी होती है,
फिर लेकर रखना क्या जाने दिल लेती है और खोती है.
लेकिन मौलाना नातिक इस प्रशंसा स्तुति से खुश नहीं हुए, उनके माथे पर उनको देखते ही बल पड़ गए | वे अपने हाथ की छड़ी को उठा-उठाकर किसी स्कूल के उस्ताद की तरह बोले,
“बरखुरदार, मियां शकील! तुम्हारे तो पिता भी शायर थे और चचा मौलाना जिया-उल-कादरी भी उस्ताद शायर थे तुमसे तो छोटी-मोटी गलतियों की उम्मीद हमें नहीं थी पहले भी तुम्हें सुना-पढ़ा था मगर कुछ दिन पहले ऐसा महसूस हुआ कि तुम भी उन्हीं तरक्कीपसंदों में शामिल हो गए हो, जो रवायत और तहजीब के दुश्मन हैं | ”
मौलाना नातिक साहब भारी आवाज़ में बोल रहे थे। शकील इस तरह की आलोचना से घबरा गए पर वे बुजुर्गो का सम्मान करना जानते थे। वे सबके सामने अपनी आलोचना को मुस्कराहट से छिपाते हुए उनसे पूछने लगे,
“हज़रत आपकी शिकायत वाजिब है लेकिन मेहरबानी करके गलती की निशानदेही भी कर दें तो मुझे उसे सुधारने में सुविधा होगी”
उन्होंने कहा,
“बरखुरदार, आजकल तुम्हारा एक फ़िल्मी गीत रेडियो पर अक्सर सुनाई दे जाता है, उसे भी कभी-कभार मजबूरी में हमें सुनना पड़ता है और उसका पहला शेर यों है:

चौदहवीं का चाँद हो या आफताब हो,
जो भी हो तुम खुदा की कसम लाजवाब हो |

”मियां इन दोनों मिसरों का वज़न अलग-अलग है पहले मिसरे में तुम लगाकर यह दोष दूर किया जा सकता था | कोई और ऐसी गलती करता तो हम नहीं टोकते, मगर तुम हमारे दोस्त के लड़के हो, हमें अजीज़ भी हो इसलिए सूचित कर रहे हैं | बदायूं छोड़कर मुंबई में भले ही बस जाओ मगर बदायूं की विरासत का तो पालन करो |’
शकील अपनी सफाई में संगीत, शब्दों और उनकी पेचीदगिया बता रहे थे उनकी दलीलें काफी सूचनापूर्ण और उचित थीं, लेकिन मौलाना ‘नातिक’ ने इन सबके जवाब में सिर्फ इतना ही कहा- “मियां हमने जो “मुनीर शिकोहाबादी” और बाद में मिर्ज़ा दाग से जो सीखा है उसके मुताबिक़ तो यह गलती है और माफ करने लायक नहीं है | हम तो तुमसे यही कहेंगे, ऐसे पैसे से क्या फायदा जो रात-दिन फन की कुर्बानी मांगे |’
उस मुशायरे में नातिक साहब को शकील के बाद अपना कलाम पढ़ने की दावत दी गई थी उनके कलाम शुरू करने से पहले शकील ने खुद माइक पर आकर कहा था- ‘हज़रत नातिक इतिहास के जिंदा किरदार हैं | उनका कलाम पिछले कई नस्लों से ज़बान और बयान का जादू जगा रहा है, कला की बारीकियों को समझने का तरीका सीखा रहा है और मुझ जैसे साहित्य के नवागंतुकों का मार्गदर्शन कर रहा है | मेरी गुज़ारिश है आप उन्हें सम्मान से सुनें | ‘
शकील साहब के स्वभाव में उनके धार्मिक मूल्य थे | अपनी एक नज़्म ‘फिसीह उल मुल्क’ में दाग के हुज़ूर में उन्होंने “साइल देहलवी”, “बेखुद”, “सीमाब” और “नूह नार्वी” आदि का उल्लेख करते हुए दाग की कब्र से वादा भी किया था:
ये दाग, दाग की खातिर मिटा के छोड़ेंगे,
नए अदब को फ़साना बना के छोड़ेंगे |
शकील साहब का व्यक्तित्व बेहद चमकदार था, वे मुशायरों में किसी हीरो से कम नहीं लगते थे और कहा जाता है कि अपने साथ अपने शागिर्दों और प्रसंशकों भी मुशायरों में ले जाते रहे।

उन्होंने अपना पहला गीत फिल्मों में इतना शानदार लिखा कि नौशाद साहब उनके हमेशा के लिए मुरीद हो गए। वो गीत था:-
हम दिल का अफ़साना दुनियां को सुना देंगे हर दिल में मुहब्बत की आग लगा देंगे
शकील साहब के गीतों में ‘प्यार किया तो डरना क्या’ से लेकर ‘नन्हा मुन्हा राही हूँ’ तक एक लम्बी और दिल अज़ीज फेहरिश्त है, जिसे दुनियां सदियों तक याद रखेगी।‎

सोमवार, 31 जुलाई 2017

खूब पढ़े होंगे उपन्यास और कहानियां, जन्मदिन पर पढ़िए कथासम्राट प्रेमचन्द के पत्र और कविताएँ

प्रेमचन्द उन साहित्यकारों में रहे हैं जिनकी लेखनी और जीवन में कोई अंतर नहीं रहा। उन्होंने गांधी जी के कहने पर नौकरी छोड़ दी थी। वे कहते रहे कि मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। मैं साहित्य और स्वराज के लिए कुछ करते रहना चाहता हूँ।
प्रेमचन्द जी के जन्मदिवस पर दो पत्र यहां पढ़ सकते हैं जो उन्होंने बनारसी दास चतुर्वेदी को लिखे थे, उनमें उनका व्यक्तित्व साफ़ झलकता है।

पहला पत्र उन्होंने 3 जुलाई 1930 में लिखा:-

“मेरी आकांक्षाएं कुछ नहीं है। इस समय तो सबसे बड़ी आकांक्षा यही है कि हम स्वराज्य संग्राम में विजयी हों। धन या यश की लालसा मुझे नहीं रही। खानेभर को मिल ही जाता है। मोटर और बंगले की मुझे अभिलाषा नहीं। हाँ, यह जरूर चाहता हूँ कि दो चार उच्चकोटि की पुस्तकें लिखूं, पर उनका उद्देश्य भी स्वराज्य-विजय ही है। मुझे अपने दोनों लड़कों के विषय में कोई बड़ी लालसा नहीं है। यही चाहता हूं कि वह ईमानदार, सच्चे और पक्के इरादे के हों। विलासी, धनी, खुशामदी सन्तान से मुझे घृणा है। मैं शान्ति से बैठना भी नहीं चाहता। साहित्य और स्वदेश के लिए कुछ-न-कुछ करते रहना चाहता हूँ। हाँ, रोटी-दाल और तोला भर घी और मामूली कपड़े सुलभ होते रहें।”

दूसरा पत्र उन्होंने 1 दिसम्बर 1935 में लिखा:-

“जो व्यक्ति धन-सम्पदा में विभोर और मगन हो, उसके महान् पुरुष होने की मै कल्पना भी नहीं कर सकता। जैसे ही मैं किसी आदमी को धनी पाता हूँ, वैसे ही मुझपर उसकी कला और बुद्धिमत्ता की बातों का प्रभाव काफूर हो जाता है। मुझे जान पड़ता है कि इस शख्स ने मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को – उस सामाजिक व्यवस्था को, जो अमीरों द्वारा गरीबों के दोहन पर अवलम्बित है-स्वीकार कर लिया है। इस प्रकार किसी भी बड़े आदमी का नाम, जो लक्ष्मी का कृपापात्र भी हो, मुझे आकर्षित नहीं करता। बहुत मुमकिन है कि मेरे मन के इन भावों का कारण जीवन में मेरी निजी असफलता ही हो। बैंक में अपने नाम में मोटी रकम जमा देखकर शायद मैं भी वैसा ही होता, जैसे दूसरे हैं -मैं भी प्रलोभन का सामना न कर सकता, लेकिन मुझे प्रसन्नता है कि स्वभाव और किस्मत ने मेरी मदद की है और मेरा भाग्य दरिद्रों के साथ सम्बद्ध है। इससे मुझे आध्यात्मिक सान्त्वना मिलती है।”

मुंशी प्रेम चंद की कविताएं

प्रेमचंद कवितायेँ नहीं लिखते थे, लेकिन उन्होंने अपनी कहानियों में कई बार कविताएँ शामिल की हैं।
यहाँ कुछ उन कविताओं या काव्यांशों को प्रकाशित कर रहे हैं, जिन्हे कथा सम्राट प्रेम चंद की कहानियों में जगह मिली है। यह किसकी रचनाएं हैं यह जानने से कहीं महत्वपूर्ण है कि ये प्रेम चंद की पसंदीदा कविताएं हैं, पसंदीदा मैं इसीलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि ये कविताएं आज यहाँ जीवन पा रही हैं, कविताएं ऐसे भी जिंदा रहती हैं । यह सिलसिला चलता रहेगा, आज पढ़िये प्रेम चंद की पसंद में दो कविताएं।
पहली कविता
क्या तुम समझते हो ?
क्या तुम समझते हो मुझे छोड़कर भाग जाओगे ?
भाग सकोगे ?
मैं तुम्हारे गले में हाथ डाल दूँगी,
मैं तुम्हारी कमर में कर-पाश कस लूँगी,
मैं तुम्हारा पाँव पकड़ कर रोक लूँगी,
तब उस पर सिर रख दूँगी,
क्या तुम समझते हो,
मुझे छोड़ कर भाग जाओगे ?
छोड़ सकोगे ?
मैं तुम्हारे अधरों पर अपने कपोल
चिपका दूँगी,
उस प्याले में जो मादक सुधा है-
उसे पीकर तुम मस्त हो जाओगे।
और मेरे पैरों पर सिर रख दोगे।
क्या तुम समझते हो मुझे छोड़ कर भाग जाओगे ?
( यह कविता रसिक संपादक कहानी से है और वहाँ इसकी रचनाकार कामाक्षी हैं )
दूसरी कविता
माया है संसार
माया है संसार सँवलिया, माया है संसार
धर्माधर्म सभी कुछ मिथ्या, यही ज्ञान व्यवहार,
सँवलिया माया है संसार।
गाँजे, भंग को वर्जित करते, है उन पर धिक्कार,
सँवलिया माया है संसार।
( यह पद गुरु मंत्र कहानी से)

रविवार, 9 जुलाई 2017

देख नहीं सकते पर दिखा सकते हैं दुनियां: नेत्रहीन कलाकारों की नाट्य प्रस्तुति देख दांतों तले ऊँगली दबाएंगे आप

निवार की दोपहर झमाझम बारिश के बीच पुणे के तिलक स्मारक मंदिर नाट्यगृह में लोग जुट रहे हैं। 12 बजे तक एक लंबी लाइन हाथों में टिकट लिए नाट्यगृह में कौतूहल के साथ प्रवेश करती है। लोग लगातार आ रहे हैं इसलिए नाट्य प्रस्तुति अपने निर्धारित समय दोपहर 12 बजे की बजाय1 बजे शुरू हो पाती है।

खचाखच भरे हॉल में घोषणा होती है, ‘ 19 नेत्रहीन कलाकार प्रस्तुत करते हैं नाटक ‘मेघदूत’।


…और तालियों की गड़गड़ाहट पर्दे के पीछे तैयार खड़े कलाकारों में आत्मविश्वास भर देती है।
मंच पर अभिनय, संवाद, गायन, नृत्य और दृश्य संयोजन देखकर दर्शक अपनी कुर्सियों से उछल पड़ते हैं। ऐसे कम्पोजिशन कि देखने वाले न बना पाएं।
नाटक ऐसी विधा है जिसमें सारी विधाएँ समाहित होती हैं। अभिनय के साथ साथ गीत-संगीत और नृत्य के द्वारा कहानी कही जाती है। सावी फाउंडेशन के सहयोग से 19 अंध कलाकारों ने महाकवि कालिदास के काव्य नाटक ‘मेघदूत’ का मंचन किया। स्वागत थोराट के निर्देशन में नेत्रहीन कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को अभिभूत कर दिया।
नाटक के लेखक और अनुवादक गणेश दिघे प्रस्तुति के दौरान मौजूद रहे। वे कहते हैं कि,
“जब मैंने लिखा था तब मैं इन दृश्यों में नाटक नहीं सोच पाया था जैसे इन कलाकारों ने प्रस्तुत किये हैं। मेरे लिए एकदम नया मेघदूत मेरे सामने मंचित हो रहा था।”
नाटक में नृत्य भी था और तलवारों का युद्ध भी.. बिना देखे एक-दूसरे के साथ इतना बेहतर तालमेल देखते ही बनता है।

नाटक के निर्देशक स्वागत कहते हैं, “हमें नजरिया बदलने की जरूरत है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि नेत्रहीन भी ऐसा कर सकते हैं, मैं तो कहता हूँ वे सबसे सुंदर कर सकते हैं। मैं नेत्रहीन प्रतिभाओं के प्रति समाज का नजरिया बदलना चाहता हूँ। और मैं इन्हें जितना सिखा रहा हूँ उससे कहीं अधिक सीख रहा हूँ। कलाकारों की मेहनत और उत्साह देखकर मुझे ऊर्जा मिलती है।”

पुणे के अंध कलाकारों की नाट्य प्रस्तुतियाँ देखकर आप चौंक जायेंगे। कालिदास का क्लासिक नाटक ‘मेघदूत’ के मंचन की जिम्मेदारी कई बार समर्थ नाट्य संस्थाएं भी नहीं लेतीं लेकिन नेत्रहीन कलाकारों की प्रस्तुति निःशब्द कर देती है। सावी फाउंडेशन की मदद से निर्देशक स्वागत थोराट की अटूट मेहनत से 19 नेत्रहीन कलाकार मंच पर अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करते हैं तो नाटक के नए अर्थ सामने आते हैं।
पुणे की सावी फाउंडेशन ने नाटक का निर्माण और इन कलाकारों को तैयार किया है। इस संस्था को शहर की महिलाएं मिलकर समाज कार्य के लिए चलाती हैं। संस्था की संस्थापक सदस्य रश्मि जी बताती हैं,
“नाटक में भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार विभिन्न संस्थाओं से जुड़े हैं। कोई बैंक में नौकरी करता है तो कोई अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर रहा है। महाराष्ट्र के कई शहरों से इन्हें चुना गया है। 80 दिनों की दिन रात मेहनत का परिणाम है कि इन्हें मंच पर उतारा गया तो शानदार प्रस्तुति सामने आई।”
कलाकारों के लिए भी ये अनुभव सपने पुरे होने से कहीं ऊपर है। पुणे में ही बैंक में काम करने वाले और नाटक में मुख्य भूमिका निभाने वाले गौरव कहते हैं,
“मैं जब भी फिल्मों या नाटकों के बारे में सुनता था तो मन ही मन सोचता था कि काश मैं भी अभिनय करूँ लेकिन लगता था कि आँखें होतीं तो मैं जरूर अभिनेता ही बनता।
अब जबकि मुझे नाटक में मुख्य भूमिका मिली तो मैं उछल पड़ा। मेरे लिए ये सपने से भी ऊपर की बात है।”
कालिदास रचित मेघदूत क्लासिक नाटक है जिसमें नाटक का पात्र यक्ष जिसे एक साल तक अपनी प्रेयसी से दूर पर्वत पर रहने की सजा मिलती है। तब आषाढ़ के पहले दिन वह मेघों के जरिए अपनी प्रेयसी को सन्देश भेजता है। मेघों को रास्ता बताते हुए कालिदास जो लिखते हैं विश्व साहित्य में प्रकृति का ऐसा अनूठा वर्णन कहीं नहीं मिलता।
नाटक में दामिनी की भूमिका निभाने वाली तेजस्विनी भालेकर मेघदूत को महसूसते हुए बताती हैं,
“मुझे घूमने का बहुत शौक है, अपना देश, पहाड़, नदियां, समन्दर… लेकिन देख न पाने के कारण ये सपना ही रह जाता है। मुझे कालिदास के मेघदूत में भूमिका मिली जिसके कारण मैंने नाटक के संवादों और गीतों से पूरा देश घूम लिया। कालिदास ने मेघों से संवाद के जरिए नदियां, पर्वत, और गांवों का ऐसा विवरण किया है कि सब स्पष्ट चित्र बन जाते हैं। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे मेघदूत करने को मिला.”

तेजस्विनी भालेकर
नाटक ऐसी विधा है जो सबको सींचती है। मानव की अनन्त सम्भावनाओं को उजागर करती है, इसमें कलाकार भी और दर्शक भी भावों से भर जाता है।
सावी फाउंडेशन Team with Writer and Director
सावी फाउंडेशन नेत्रहीन दिव्यांगों के लिए ब्रेल लाइब्रेरी से लेकर वोकेशनल ट्रेनिंग के कई कार्यक्रम चलाती है। महिलाओं के सामूहिक प्रयास से एक नई सामाजिक चेतना का रास्ता बन रहा है। पुणे की व्यावसायिक महिलाएं मिलकर सावी फाउंडेशन का कार्य आगे बढ़ा रही हैं। अगर आओ भी इनसे जुड़ना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाकर जुड़ सकते हैं।
और अंत में हेलन केलर की कविता की पंक्तियाँ-:
“क्या तुमने अंधेरों के खजाने में घुसकर देखा है
अपने अंधेपन को खोजो
उसमें अनगिनत मोती हैं जीवन के..”

Published at http://hindi.thebetterindia.com/3725/visually-challenged-actors-theatre-pune-meghdut/ 

गुरुवार, 2 जून 2016

शोषण से स्टंट तक का सफर

गीता बॉलीवुड की सफल स्टंट वुमेन है. कई फिल्मों में बॉलीवुड की दिग्गज अभिनेत्रियों के डबिंग किरदार भी निभाए हैं, जिनमे करीना कपूर, बिपासा बासु और दीपिका पादुकोण भी शामिल हैं. गीता दो बच्चों की बहादुर माँ है. टीवी के कई जोखिम भरे रियलिटी शोज में काम कर चुकी हैं. लेकिन इस सफल गीता की कहानी इतनी आसान नहीं रही है. 
पंद्रह साल की उम्र में ब्याही गई गीता को ससुराल में सबने प्रताड़ित किया। गीता ने सोचा बच्चे हो जायेंगे तो शायद बात बन जाए, लेकिन पति का अत्याचार बढ़ता गया. पति घंटों बाल नोंचता था, कई बार दीवारों में सर मारा। गीता को समझ ही नहीं आ रहा था कि  वे लोग चाहते क्या हैं. 
गीता के साथ ही नहीं ये हमारे समाज की दर्दनाक सच्चाई है, बहु को नौकरानी से भी बदतर समझा जाता है और वो कभी आवाज़ भी न उठा पाए इसलिए हमेशा प्रताड़ित किया जाता है. पितृसत्तात्मक समाज में पति अपनी औकात इसी में समझता है कि उसकी पत्नी उसकी मार कितनी चुप्पी से सहती रहती है. वो नशा करें, बेहूदापन करे सब जायज है, पत्नी को सिर्फ झेलना है. घर में बने रहने की यही एकमात्र शर्त होती है.
गीता ने सबकुछ झेला और एक दिन जब हद हो गई तो वो निकल पडी। कहाँ जाएंगी? क्या करेगी? उसे खुद भी नहीं पता था और ना ही उसने उस वक़्त सोचने की जहमत उठाई। वो बस उस दर्द से भाग जाना चाहती थी. 
गीता के ससुराल वालों ने उसे पनाह देने वाले उसके बड़े बहनोई को भी नहीं छोड़ा और उन्हें परेशान करने लगे. ससुराल वालों की योजना थी कि जब कहीं कुछ नहीं मिलेगा तो खुद ही मजबूर होकर घर आएगी, लेकिन गीता ये ठान कर निकली थी कि मर जाएगी लेकिन अब नहीं लौटेगी।
गीता ने टूटे-फूटे घरों में गुजारा कर मेहनत मजदूरी की, गुरूद्वारे के लंगर से बच्चों का पेट भरा,दूसरे के घरों में रोटियां बनाईं,..गीता को ज़िन्दगी किन-किन रास्तों पर नहीं ले गई. उसे सबकुछ करने को मजबूर कर दिया गया. लेकिन गीता एक बात की हमेशा गाँठ बांधे रही की कभी अपना जमीर नहीं बेचेगी।
और एक दिन उसके जज्बे को सटीक रास्ता मिल गया. ज़िन्दगी जुनूनी लोगों की परीक्षा बहुत लेती है लेकिन जब बदले में देती है तो यकीनन छप्पर फाड़ के देती भी है.
सुनिए गीता की कहानी। उसी की जुबानी,... जो आपको रुलाएगी लेकिन झोली भर हिम्मत भी दे जाएगी,....