रविवार, 15 जून 2014

पापा

उंगली पकड कर चलना सिखाया
बाहों में लेकर झूला झुलाया
अपने हाथों से निवाला खिलाया
अक्षरों से पहली मुलाकात करवाई
कांधे पे बिठा के दुनियां दिखाई
दुनिया की मेरी हर पसंद दिलाई

छोटी छोटी गलतियों पर डांटा
ताकि कोई पराया न डांट सके
मैं नाराज हुआ तो कभी नहीं मनाया
ताकि मैं कहीं रूठना न सीख जाऊँ
मेरी छोटी-मोटी उपलब्धियों पर कभी प्रसंशा नहीं की
ताकि मुझे कहीं गुरूर न हो जाए

पापा,
एक आप ही तो हैं,
जिनसे मांगते वक्त मैं कभी ये नहीं सोचता कि
ये चीज मुझे मांगनी चाहिए थी या नहीं..

रविवार, 11 मई 2014

क्या लिखूं 'माँ' लिखने के बाद..

मैं जानता हूँ आज का  दिन थेंक्स बोलने का है, हर माँ को उसकी सारी कुर्बानियों और जीवन देने के लिए थेंक्यू बोलकर उसका एहसान चुकाने का दिन.. मगर मैं ये औपचारिकता पूरी नहीं कर पाउँगा... क्यूंकि मैं उस एहसान को एक आसान  और महज़ औपचारिक शब्द में नहीं बांधना चाहता.
लेकिन मुझे भी कुछ कहना है आज. जब पूरी दुनियाँ अपनी माँ से बात कर रही है तो मैं भी वो सब कुछ लिखना  चाहता हूँ जो मैं अपनी माँ से बोल नहीं सकता. बडी हिम्मत कर के लिख पाया हू....



मेरी प्यारी माँ, 

            स्थानांतरण में आप छोड़ गईं हैं,,,,,,, 
सारी दुनियां से बड़ा स्मृतियों का संसार..
कितनी ही बातें, नसीहतें, कितनी घटनाएँ और कितने सारे पाठ..
मेरी बड़ी से बड़ी परेशानी का छोटा सा हल
हजारों उलझनों का प्यारा सा सोल्यूशन
किताबों से लेकर ज़िंदगी तक का ज्ञान..
मेरी हर नादान कोशिश पर बड़ा सा कोम्पलीमेंट..
मेरे आसपास रहकर एक पूरा कवच बना दिया था 
मेरे नन्हे सपनो को पनपने दिया, अपने दुनियां से बड़े आँचल की छाँव में..
मेरी हर इच्छा को पंख लगाकर, छोड़ दिया खुले आसमान में ..
मैंने जो करना चाहा उसमे आप जुट गयीं जी जान से...
                       न जाने कितनी ही बातें, जो आपने कभी बताईं भी नहीं 
                      मगर आपके सानिध्य से  मेरे व्यक्तित्व में शामिल हो गयी
    
जीतने पर इतराना नहीं
हारने पर रोना नहीं
गिरने पर धूल झटककर 
फिर से उठ खड़े होना सिखाया 
'लक्ष्य' और 'आदर्श' का फासला
तय करवाया 
मेरी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर पीठ थपथपायी 

ऐसी ही ढेरों स्मृतियाँ हैं हमारे साझे की, मैं कभी नहीं बता पाउँगा आपने मुझे क्या दिया? क्यूंकि आपने माँ की तरह कभी उसका एहसास नहीं होने दिया. आपकी हर भावना एक माँ से कभी भी एक रत्ती कम नहीं लगी.. ठीक माँ की तरह डांटना और उसके बाद बुला के समझाना..  और उससे भी बड़ी ताकत थी उस एक अनजान भरोसे की. जो न जाने कब बन गया था कि हर मुश्किल आपसे आकार कह देना.. हर शिकायत आपके पास ले जाकर पटकना.. और समाधान पा लेना...
 जिस दिन आपने जाने की बात की उस दिन सारी दबी जड़ें उखड गईं, यकीन  नहीं कर पाया कि आज तक एक बड़े बरगद की छाया में खेलते कूदते रहे. कभी सोचा ही नहीं उसकी छाँव के बिना जीवन कैसा होगा. अचानक लगा जैसे सर से आसमान गायब हो रहा  है, उससे पहले उस आसमान की परवाह ही नहीं थी.. और ये सब भी आपने एक माँ की तरह किया कि जब माँ तक पास रहती है तब तक अपने होने तक का एहसास भी नहीं होने देती और जब दूर होती है तो उसकी मौजूदगी नज़र आती है... सिर्फ उसका ही वजूद होता है..
      आज भी सेंटर वही है, वही ईमारत, वही लाइब्रेरी, वही  क्लासरूम और कुल मिला के वही cms..                                        

आप नहीं आती न पढाने.......

तो अब  'दिन' ही चला आता है शिक्षक बनकर
अलख सुबह से देर रात तक, बेरुखी के थपेडों से सिखाता रहता है.
और मैं भी एक अनुशासित बच्चे की तरह सीखता रहता हूँ
खुद ही गिरता हूँ, संभालता हूँ, फिर उठकर चल देता हूँ
अब कोई गिला नहीं होता किसी से
किसी से कोई शिकायत नहीं करता
नहीं रूठता किसी से अब..
आज भी जब नहीं चलती क्लास तो मैं दूर कहीं अकेले बैठे पढता रहता हूँ अंग्रेजी के कुछ शब्द
नहीं जाता किसी को बुलाने क्लास के लिए..
जो पढाया जाता है पढ़ लेता हूँ चुपचाप...

        इसका अर्थ ये बिलकुल नहीं है कि मैं बहुत दुखी हूँ, या परेशान हूँ..
        रोता भी नहीं हूँ क्यूंकि कमजोर होना नहीं सिखाया आपने
        जूझता भी नहीं हूँ किसी से, क्यूंकि ऊँचा बनना है मुझे
        निराश, हताश बिलकुल नहीं हूँ, आगे बढ़ना है मुझे
        आपकी शिक्षा को मुकाम देना है, मंजिल तक पंहुचकर
बस इस परिवर्तन के सांचे में ढलने का प्रयास कर रहा हूँ
कुछ समय लगेगा माँ की रिक्तता को भरने में .....
                             क्यूंकि ,
                
       
          माँ का होना भरे-पूरे संसार का होना होता है..
          उसकी सूरत में खुशियों का जादू-टोना होता है..
          लगता रहता है कि तुम गिरोगे तो उठा लिए जाओगे..
          गलती करोगे तो डाट  खा जाओगे
          रोओगे तो चुपा लिए जाओगे...
          

कई दिनों तक खोजा था मैंने आपको उसी लाइब्रेरी वाली ऑफिस में..  
आदतन कदम भीतर ही जाकर ठहरते थे.. और मुंह से निकल पड़ता-"आज मेम नहीं आयीं हैं क्या ?"
भगवान का शुक्र है कि एक आवाज़ मेरे इस पागलपन को छुपा लेती थी
"हाँ बताओ क्या चाहिए"- लाइब्रेरी वाली मेम ऑफिस में लगी अलमारी की आरती उतारते बोल पड़ती.
            आज भी यकीन होता है कि आप यहीं हैं.
         माँ की अनुपस्थिति में उसका संसार हमें घेरे रहता है..
                 

माँ ढूंढता हूँ तुम्हें तुम्हारे  ही जैसे किसी चेहरे में..
आपकी  सूरत तो मिलती सी है, मगर वो माँ नज़र नहीं आती.....

                                                                                                               --आपका बेटा                 

मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

वक़्त कब कहाँ रुका है किसी के लिए...

.

कमबख्त एक पल भी नहीं ठहरता कि,

रुक जाएँ कुछ साँसे

थम जाये नब्ज कुछ लम्हे  लिए

न बहे लहू इन धमनियों में कुछ पल

ठहर जाये आँखों के ख्वाबों का कारवां,   कुछ अरसे के लिए

ख़त्म  जाएँ सवालों के नुकीले नश्तर,    कुछ  लिए

जम जायें अतीत के पन्नों के चलचित्र,  कुछ लम्हों के लिए

  मैं न रहूँ,.... रहकर भी… कुछ वक़्त के लिए 

रविवार, 13 अप्रैल 2014

दाग अच्छे हैं ?

केजरीवाल ने जब दिल्ली के मुख्यमंत्री  पद  से इस्तीफ़ा दिया
तो  बिना किसी अफ़सोस के प्रधानमंत्री की  दौड़ में शामिल हो गये |
और फिर राज्यस्तरीय ज्वलंत रैलियां राष्ट्रस्तरीय परिवर्तनकारी  रोड शो में तब्दील हो गई | विरोधियों के कान खड़े हुए तो कभी हिंदी साहित्य की वर्णमाला  भी न जानने  वाले नेताओं के मुखारबिन्दु  से भी व्यंग्य फूट पड़े | एक राज्य न चला पाने के आरोपी अरविंद केजरीवाल पर देश  कैसे चलाने का पूर्वाभासी तीर छोड़ दिया गया | 'आप' को बच्चा कहा गया मौसमी बयार की  संज्ञा दी गई , और भारतीय जानता पार्टी के प्रधानमंत्री पद  के उम्मीदवार  ने तो केजरीवाल का पतन निश्चित कर दिया | ..



बस यहीं से मामला बिगड गया , अपनी धुन के जिद्दी केजरीवाल ने भी ईंट के जबाब में पत्थर फेंक दिया और वही पत्थर मोदी की  राह में रोड़ा बन गया | दरअसल अपनी फजीहत देखकर केजरीवाल ने घोषणा कर दी कि मोदी जहां से चुनाव लड़ेंगे, वे उनके सामने ही ताल ठोंकेंगे  |
     किसी फ़कीर कि तरह लंगोटी कसकर  तैयार केजरीवाल के पास खोने के लिए कुछ नहीं है मगर मोदी की मेहनत और पूंजी अगर निरर्थक रही तो गुजरात का दिखावटी विकास भी रुक जायेगा | अतः बड़ी जद्दोजहद के बाद नरेन्द्र मोदी को वाराणसी से उम्मीदवार बनाया गया | साफ जाहिर था कि केजरीवाल की ताल में धमक थी | मगर असली किस्सा तो उसके बाद घटा | जब केजरीवाल ने अपने बनारस प्रथम आगमन की तैयारियां की |

अभी केजरीवाल ने ट्रेन पकड़ी भी नहीं थी कि मोदी ने अपने लिए सुरक्षित स्थान ढूंड लिया | अब वे गुजरात के वड़ोदरा से भी चुनाव लड़ेंगे और वहां उनकी सीट सुरक्षित मानी जा रही है  और ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या बनारस से मोदी असुरक्षित है ?

             खैर, केजरीवाल 25 मार्च को अलख सुबह बनारस पहुँच गए, जाते ही बहती गंगा में डुबकी लगा दी. दिन  भर रोड शो प्रस्तावित था और शाम को महारैली.  केजरीवाल रोड शो के दौरान जैसे ही अपने रथ पर चढ़े कि पीछे से फूलों की बौछार सा आभास हुआ, लेकिन फूल इतना चुभते तो नही हैं, केजरीवाल असमंजस में पड़ गए, और जैसे ही पीछे मुड कर हालात का जायजा लेना चाहा कि अचानक एक किसी परिंदे का अंडा उनके मुंह पर अपनी छाप छोड़ गया. बस यही तो चाहते थे 'आप'. उन्होंने उस अंडे के तिलक को नहीं मिटाया बल्कि शाम की रैली में दहाड़ लगा दी कि ''मैंने तो पहले ही अंदेशा जताया था कि ये डरने वाले लोग मुझ पर छुप कर हमला करेंगे''


                                       
 यहीं एक बार फिर मोदी-खेमा मुंह की खाने का भविष्य तय कर गया, केजरीवाल पर जमकर स्याही फेंकी गई, मुमकिन है कई कलमें खाली हो गईं होंगी. वे कलमें जो समाज और देश बदलने की कुव्वत रखती है उसका खून यूँ ही सफ़ेद कमीज पर न्योछावर कर दिया गया. और ये दाग केजरीवाल ने नहीं धोए, और संजो के रख लिए. हो न हो यही दाग अच्छे  साबित हो जाएँ. क्यूंकि जानता की सुहानिभूती समेत ले गए हैं ये दाग, केजरीवाल पर हमला मात्र जनता का रुख केजरीवाल की तरफ मोड देने के लिए काफी है. मसलन वोट करने वाले लोग ये सोच कर तो जायेंगे ही कि जहां सत्ता में आने से पहले एक साफ छवि वाले संघर्षशील आम आदमी पर हमला हो रहा है तो सत्ता में आने के बाद तो ये सेवक आम जन को कैसे बख्शेंगे...